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वेद विज्ञान आलोक

पुस्तक का नाम – वेदविज्ञान – आलोकः (महर्षि ऐतरेय महीदास प्रणीत – ऐतरेय ब्राह्मण की वैज्ञानिक व्याख्या)

व्याख्याकार का नाम – आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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पुस्तक का नाम – वेदविज्ञान – आलोकः (महर्षि ऐतरेय महीदास प्रणीत – ऐतरेय ब्राह्मण की वैज्ञानिक व्याख्या)

व्याख्याकार का नाम – आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वेदों में समस्त ज्ञान – विज्ञान मूलरूप से विद्यमान है। जिसे समझने और समझाने के लिए, उसका मानव हितार्थ उपयोग करने के लिए अनेकों ऋषियों – महर्षियों और विद्वानों देवों ने अपना – अपना योगदान दिया है। वेदों पर अनुसंधान और मनुष्यों में उसके विज्ञान का प्रसार – प्रचार का कार्य महर्षि ब्रह्मा से लेकर महर्षि दयानन्द तक चला है। इन सबने वेदों के व्याख्यान किए है। जिससे कि वेदों का रहस्य सभी मानव जाति के लिए बोधगम्य हो। इनमें वेदों के व्याख्यान ग्रन्थ ब्राह्मण ग्रन्थ वेदों के साक्षात् व्याख्यान ग्रन्थ होने के कारण वेदों के सर्वाधिक निकट और वेदों की विद्या के प्रकाशक है। इन ग्रन्थों के अध्ययन के बिना वर्तमान में वेद विद्या को समझना असाध्य कार्य है। इन ब्राह्मण ग्रन्थों में भी सर्वाधिक प्राचीन ब्राह्मण ग्रन्थ ऋग्वेद का महर्षि ऐतरेय महीदास जी द्वारा रचित ऐतरेय ब्राह्मण है। इस ग्रन्थ में अनेकों वैज्ञानिक रहस्य हैं, किन्तु वे सभी वैज्ञानिक तत्त्व अति गूढ़ भाषा में विद्यमान है। इस भाषा को न समझ पाने के कारण ही कई विद्वानों ने इस ग्रन्थ का अश्लीलता और हिंसात्मक अर्थ, व्याख्यादि की। उन्हीं विद्वानों की व्याख्याओं को देखकर बिना कुछ गम्भीर विचार किए कुछ आर्य विद्वानों ने इन ग्रन्थों में प्रक्षिप्त की कल्पना भी कर ली। जबकि ये स्थल न तो अश्लील है और न ही हिंसक बल्कि ये विशुद्ध वैज्ञानिक सिद्धान्तों से ओत – प्रोत है।

इस ग्रन्थ पर लगने वाले हिंसक और अश्लील तथा प्रक्षेप के आरोपात्मक कलङ्कों को आचार्य अग्निव्रत जी नैष्ठिक जी ने अपने प्रस्तुत भाष्य “वेदविज्ञान आलोक” से मुक्त करने का एक उत्तम प्रयास किया है। इस ग्रन्थ द्वारा आचार्य जी ने लगभग हजारों वर्षों से लुप्त वैदिक विज्ञान को खोज निकाला है जिससे आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों की अनेकों समस्याओं का समाधान हो जाता है तथा गलत और काल्पनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों की निवृत्ति हो जाती है। इस ग्रन्थ से जहां महान वैज्ञानिक सिद्धान्त प्रस्फुटित होते हैं वहीं यह ग्रन्थ ईश्वर के वैज्ञानिक स्वरूप और उसकी सृष्टि निर्माण में कार्यशैली को जानने में भी अत्यन्त सहायक है अर्थात् यह ग्रन्थ भौत्तिकवेत्ताओं और अध्यात्मवेत्ताओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है। जहां इस ग्रन्थ के भाष्य में सायण आदि भाष्यकारों ने इसे बूचड़खाना सा बना दिया था वहीं प्रस्तुत भाष्य के द्वारा आप जानेंगे –

1) Force, Time, Mass, Charge, Space, Energy, Gravity, Graviton, Dark Energy, Dark Matter, Mass, Vacuum Energy, Mediator Particles आदि का विस्तृत विज्ञान क्या है? इनका स्वरूप क्या है? सृष्टि प्रक्रिया में इनका योगदान है?
2) जिन्हें संसार मूल कण मानता है, उनके मूल कण न होने का कारण तथा इनके निर्माण की प्रक्रिया क्या है?
3) अनादि मूल पदार्थ से सृष्टि कैसे बनी? प्रारम्भ से लेकर तारों तक के बनने की विस्तृत प्रक्रिया क्या है? Big Bang Theory क्यों मिथ्या है? क्यों universe अनादि नहीं है, जबकि इसका मूल पदार्थ अनादि है?
4) वेद मन्त्र इस ब्रह्माण्ड में सर्वत्र व्याप्त विशेष प्रकार की तरंगों के रूप में ईश्वरीय रचना है। ये कैसे उत्पन्न होते हैं?
5) इस ब्रह्माण्ड़ में सर्वाधिक गतिशील पदार्थ कौनसा है?
6) गैलेक्सी और तारामंडलों के स्थायित्व का यथार्थ विज्ञान क्या है?
7) वैदिक पंचमहाभूतों का स्वरूप क्या है?
8) संसार में सर्वप्रथम भाषा व ज्ञान की उत्पत्ति कैसे होती है?
9) भौत्तिक और आध्यात्मिक विज्ञान, इन दोनों का अनिवार्य सम्बन्ध क्या व क्यों है?
10) ईश्वर सृष्टि की प्रत्येक क्रिया को कैसे संचालित करता है?
11) “ओम” ईश्वर का मुख्य नाम क्यों हैं? इसकी ध्वनि इस ब्रह्माण्ड में क्या भूमिका निभाती है?

ऐसे ही अनेकों प्रश्नों के उत्तर आपको इस ग्रन्थ में मिलेंगे। इस ग्रन्थ से –

1) ब्रह्माण्ड के सबसे जटिल विषय Force, Time, Space, Gravity, Graviton, Dark Energy, Dark Matter, Mass, Vacuum Energy, Mediator Particles आदि के विज्ञान को विस्तार से समझा सकेंगे।
2) ब्रह्माण्ड के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए एक नई Theory दे सकेंगे। Vedic Rashmi Theory में वर्तमान की सभी Theories के गुण तो होंगे परन्तु उनके दोष नहीं होंगे।
3) आज Partical Physics असहाय स्थिति में है। हम वर्तमान सभी Elementary Particles व Photons की संरचना व उत्पत्ति प्रक्रिया को समझा सकेंगे।
4) वैज्ञानिक के लिए 100 – 200 वर्षों के लिए अनुसंधान सामग्री दे सकेंगे।
5) इस ग्रन्थ से सुदूर भविष्य में एक अद्भूत भौत्तिकी का युग प्रारम्भ हो सकेगा, जिसके आधार पर विश्व के बड़े – बड़े टैक्नोलॉजिस्ट नवीन व सूक्ष्म टैक्नोलॉजी विकास कर सकेंगे।
6) प्राचीन आर्यावर्त्त में देवों, गन्धर्वों आदि के पास जिस टैक्नोलाँजी के बारे में पढ़ा व सुना जाता है, उसकी ओर वैज्ञानिक अग्रसर हो सकेंगे।
7) हम जानते हैं कि विज्ञान की विभिन्न शाखाओं यथा – रसायन विज्ञान, जीव – विज्ञान, भूगर्भ विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान, आयुर्विज्ञान आदि का मूल भौत्तिक विज्ञान में ही है। इस कारण वैदिक भौत्तिकी के इस अभ्युदय से विज्ञान की अन्य शाखाओं के क्षेत्र में भी नाना अनुसंधान के क्षेत्रों में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ सकेगा।
8) वैदिक ऋचाओं का वैज्ञानिक स्वरूप एवं इससे सृष्टि के उत्पन्न होने की प्रक्रिया ज्ञात हो सकेगी।
9) वेद विज्ञान अनुसंधान की जो परम्परा महाभारत के पश्चात् लुप्त हो गयी थी, वह इस भाष्य से पुनर्जीवित हो सकेगी।
10) संस्कृत भाषा विशेषकर वैदिक संस्कृत को ब्रह्माण्ड़ की भाषा सिद्ध किया जा सकेगा।
11) भारत विश्व के एक सर्वथा नयी परन्तु वस्तुतः पुरातन, अद्भूत वैदिक फीजिक्स दे सकेगा, इसके साथ ही वेद एवं अन्य आर्ष ग्रन्थों के पठन – पाठन परम्परा को भी नयी दिशा मिल सकेगी।
12) इससे वेद तथा ऋषियों की विश्व में प्रतिष्ठा होकर भारत वास्तव में जगद्गुरु बन सकेगा।
13) हमारा अपना विज्ञान अपनी भाषा में ही होगा, इससे भारत बौद्धिक दासता से मुक्त होकर नये राष्ट्रीय स्वाभिमान से युक्त हो सकेगा।
14) इस कारण भारतीयों में यथार्थ देशभक्ति का उदय होकर भारतीय प्रबुद्ध युवाओं में राष्ट्रीय एकता का प्रबल भाव जगेगा।
15) यह सिद्ध हो जाएगा कि वेद ही परमपिता परमात्मा का दिया ज्ञान है तथा यही समस्त ज्ञान विज्ञान का मूल स्त्रोत है।

आशा है कि विद्वतजन इस गम्भीर ग्रन्थ का गम्भीरता से अध्ययन करेगें और अन्य ग्रन्थों पर भी इसी प्रकार अनुसंधान की ओर अग्रसर होंगे।

 

आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक जी का बहु-प्रतीक्षित अनुसंन्धानात्मक शोध ग्रन्थ

 

वेद संसार के सबसे प्राचीन एवं सनातन ग्रन्थ हैं। इन्हें समझने के लिए प्राचीन ऋषियों ने इनके व्याख्यान रूप अति महत्वपूर्ण ग्रन्थ, ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना की। इनमें ऋग्वेद का ब्राह्मण ग्रन्थ महर्षि ऐतरेय महीदास जी द्वारा लगभग 7000 वर्ष पूर्व रचा गया, इसका नाम ऐतरेय ब्राह्मण है। यह ब्राह्मण ग्रन्थ सबसे प्राचीन ब्राह्मण ग्रन्थ है। ब्राह्मण ग्रन्थों की भाषा अति जटिल व सांकेतिक होने से ये ग्रन्थ सदैव रहस्यमय रहे। देश व विदेश के कुछ भाष्यकारों ने इनकी कर्मकांडपरक व्याख्या की। श्री आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक ने इस ग्रन्थ का संभवतः विश्व में प्रथम बार वैज्ञानिक भाष्य किया है। इस भाष्य का नाम ‘वेदविज्ञान-आलोकः’ है, जो चार भागों में 2800 पृष्ठों में प्रकाशित हुआ है।

‘वेदविज्ञान-आलोकः’ ग्रन्थ वैदिक विज्ञान संबंधी साहित्य का एक अति महत्वपूर्ण व क्रांतिकारी ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में Cosmology, Astrophysics, Quantum Field Theory, Plasma Physics, Particle Physics and String Theory जैसे अति महत्त्वपूर्ण एवं गंभीर विषयों का विशद विवेचन है। वर्तमान सैद्धांतिक भौतिकी पिछले लगभग 50 वर्ष से विशेष कठिन दौर से गुजर रही है। भौतिक अनुसंधान के क्षेत्र में अनेक बाधाएँ व समस्या खड़ी हुई हैं। Higgs Boson एवं ग्रेविटेशन वेव्स, जिनकी परिकल्पना भी इन 50 वर्षों से पूर्व ही की गई थी, को छोड़कर अन्य कोई विशेष अनुसंधान नहीं हो पाया है। वैसी स्थिति में यह ग्रन्थ वर्तमान सैद्धांतिक भौतिकी के लिए बहुत सहायक होगा।

स्पेस, टाइम, मूल कणों एवं फोटोन की उत्पत्ति व संरचना, डार्क मैटर, डार्क एनर्जी, ग्रेवीटोन व अन्य फील्ड पार्टिकल्स की उत्पत्ति, ग्रेवीटोन की संरचना, रेड शिफ्ट व CMB Strings का कारण, द्रव्यमान व ऊर्जा का स्वरूप व उत्पत्ति, विद्युत् आवेश का स्वरूप व उत्पत्ति, विभिन्न मूल बलों की उत्पत्ति, स्वरूप एवं विस्तृत क्रियाविज्ञान, तारों व गैलेक्सियों की उत्पत्ति की विस्तृत प्रक्रिया, गैलेक्सी में तारों की कक्षाओं का निर्माण, ब्रह्मांड की मूल अवस्था, सृष्टि उत्पत्ति की विस्तृत प्रक्रिया, जो मूलकणों व फोटोन की उत्पत्ति से कई चरण पूर्व से प्रारम्भ होती है, भौतिक विज्ञान के इन अनेक गम्भीर व मौलिक विषयों की इस ग्रन्थ में विस्तृत व्याख्या की गई है। इन विषयों में वर्तमान सिद्धांतिक भौतिकी जहाँ-जहाँ गम्भीर व अनसुलझी समस्याओं में फंसी है, उनका तर्कसंगत एवं विस्तृत समाधान इस ग्रन्थ में आचार्य अग्निव्रत ने किया है।

आधुनिक भौतिकी के इन सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषयों के अतिरिक्त इस ग्रन्थ में ईश्वर के अस्तित्व की अनिवार्यता, उसके स्वरूप तथा उसके द्वारा सृष्टि रचना, संचालन व प्रलय के क्रियाविज्ञान को बड़े ही अद्भुत ढंग से समझाया गया है। इस आध्यात्मिक विज्ञान का भौतिक विज्ञान से समन्वय व सम्बंध आश्चर्यजनक है। ईश्वर के क्रियाविज्ञान अर्थात् उसके कार्य करने की प्रणाली को समझ कर आधुनिक सैद्धांतिक भौतिक वैज्ञानिकों को सृष्टि को गहराई से समझने में सहयोग मिलेगा। और उनकी अनेक समस्याएं स्वतः ही दूर हो सकेंगीं।

इस ग्रन्थ में वैदिक श्रौत यज्ञों की परम्परा का सृष्टि विज्ञान के साथ सम्बंध सिद्ध होकर उन यज्ञों का वैज्ञानिक प्रयोजन सिद्ध हो सकेगा। इससे याज्ञिक विद्वानों को यह बोध हो सकेगा कि प्राचीन सनातन वैदिक यज्ञ ब्रह्माण्ड में विज्ञान को समझाने के लिए मानचित्र के समान हैं। यह कार्य वैदिक यज्ञ परम्परा के पुनरुद्धार के लिए अति महत्वपूर्ण होगा।

इस ग्रन्थ में वेद के वैज्ञानिक स्वरूप की विवेचना आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक की एक अति महत्वपूर्ण खोज है। आपने इस ग्रन्थ में बड़े तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक ढंग से यह सिद्ध किया है कि वैदिक ऋचाएं वस्तुतः सृष्टि के मूल उपादान पदार्थ में उत्पन्न कम्पनों का ही रूप हैं, जो वाणी के परा, पश्यन्ती रूप में प्रकट होती हैं। इसमें बताया गया है कि वैदिक ऋचाएं अति सूक्ष्म कम्पित पदार्थों का रूप हैं। आधुनिक भौतिकी जिन स्ट्रिंग्स द्वारा मूल कणों के निर्माण की बात करती है, वस्तुतः वैदिक मंत्र उन Strings से भी सूक्ष्म कम्पित पदार्थ हैं। इन कम्पित पदार्थों के गुणधर्म, उनकी उत्पत्ति का क्रियाविज्ञान, उनके द्वारा सृष्टि कैसे बनती व संचालित होती है, मूलकणों से लेकर तारों तक सभी पदार्थ इनसे कैसे बनते व अपने सभी कार्य करते हैं, यह सब दर्शाना इस ग्रन्थ की महत्वपूर्ण व अद्वितीय विशेषता है।

इस ग्रन्थ की पूर्वपीठिका जो 420 पृष्ठ की है, में वर्तमान सृष्टि उत्पत्ति विज्ञान की समीक्षा करते हुए वैदिक सृष्टि उत्पत्ति की व्याख्या की गई है। इसमें वेद व ब्राह्मण ग्रन्थों के भाष्य करने की वैज्ञानिक पद्धति, जो व्याख्याकार की दृष्टि में महाभारत काल के पश्चात् लुप्त हो गई थी, को ईश्वर कृपा व आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती के संकेतों की सहायता से खोजा है। इसमें वेद आदि ग्रंथों के अन्य भाष्यकारों के भाष्य से अपने भाष्य की तुलना करने के लिए कुछ वेद मंत्रों का तीन प्रकार की शैली से भाष्य भी उदाहरण के रूप में दर्शाया है।

महाभारत काल के पश्चात् वैदिक धर्म जिन सामाजिक व धार्मिक बुराइयों से ग्रस्त हो गया था, उन सबका उन्मूलन भी इस ग्रंथ को समझने से संभव हो सकेगा। इस प्रकार हमारा भारत मध्य काल से लेकर अब तक जिन सामाजिक समस्याओं से ग्रस्त रहा व है तथा जो वेद आदि शास्त्र को न समझने अथवा उन्हें मिथ्या ढंग से समझने से उत्पन्न हुई थीं, को दूर करने में भी यह ग्रन्थ दूरगामी लाभ देगा।

इस ग्रन्थ में चारों वेद, विभिन्न ऋषियों के लगभग 68 ग्रन्थों एवं अन्य संस्कृत ग्रन्थों सहित कुल 94 ग्रन्थों के अतिरिक्त आधुनिक भौतिकी के लगभग 30 उच्च स्तरीय ग्रंथों को उद्धृत किया गया है।

संक्षिप्त में यह ग्रन्थ भारत के प्राचीन वैदिक ज्ञान विज्ञान को सम्पूर्ण मानव जाति के लिए हितकारी सिद्ध करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह आधुनिक भौतिकी को एक नई दिशा देकर भारत को वास्तव में सैद्धांतिक भौतिकी के क्षेत्र में जगद्गुरु बना सकेगा। यह ग्रन्थ हिंदी भाषा में है। श्री आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक के शिष्य श्री विशाल आर्य, जिन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से सैद्धांतिक भौतिकी में M.Sc. की है, ने इस ग्रन्थ का संपादन किया है। श्री वैदिक स्वस्ति पंथा ट्रस्ट, भागलभीम, भीनमाल, जिला जालोर, राजस्थान, जिसके अध्यक्ष श्री आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक हैं, ने इस ग्रन्थ को प्रकाशित किया है।

Abstract
Vedas are the oldest texts of the world. To understand them, the ancient sages composed their very important explanatory texts, named Brahmanical texts. Among these, the Brahmin Granth of Rigveda was created by Mahrishi Aitreya Mahidas about 7000 years ago, named Aitreya Brahmin. This is the oldest Brahmin text. Having the language of Brahmanic texts highly complex and indicative, these texts are always mysterious. Some commentators from the country and abroad have their rhetorical explanation. Shri Acharya Agnivrat Naishthik has probably made scientific interpretation of this for the first time in this world. The name of this commentary is Ved Vigyan Alok, which is published in 2800 pages in four volumes.
Ved Vigyan Alok, is a very important and revolutionary book of Vedic science literature. In this text, detailed explanation of very important and serious topics, is given such as Cosmology, Astrophysics, Quantum Field Theory, Plasma Physics, Particle Physics and String Theory. The modern theoretical physics is going through a difficult period from almost 50 years. Many obstacles and problems have arisen in the field of physical research. Except for Higgs Boson and Gravitational Waves, which were predicted earlier than 50 years ago, no other special research has been done. In that case, this text will be very helpful for the modern theoretical physics.
Origin and structure of space and time, origin of particles and photons, the origin of dark matter, dark energy, gravity and other field particles, structure of graviton, red shift, cause of CMB, form and origin of mass and energy, nature of electric charge and origin, the origin, nature and detailed mechanism of various fundamental forces, detailed process of creation of stars and galaxies, construction of stars’ orbits in the galaxy, the initial state of the universe, the detailed procedure of origin of the universe, which starts several steps prior than the origin of elementary particles and photons. The detailed explanation has been given about many of these serious and fundamental topics of physics in this book. In these fields, where the modern theoretical physics is in serious and unsolved problems, those detailed and logical solution has been given in this text.
In addition to these most important topics of modern physics, the compulsion of God’s existence, the mechanism of creation, operation and destruction by him, has been explained in a very wonderful way in this book. Coordination and relation to the physical science of this spiritual science is amazing. By understanding the mechanism of God’s work, modern theoretical physicists will be able to deeply understand the creation. And many of their problems will be automatically solved.
In this text, the tradition of Vedic Shraut Yajnyas will be proved scientific by proving their relationship with the universe. This will help the Yajnyik scholars to realize that ancient Vedic Yajnya is like the map to explain the science of the universe. This work will be very important for the revival of the Vedic Yajnya tradition.
In this text, the interpretation of the scientific nature of the Vedas, which is called Vaidic Rashmi Theory of the Universe, is a very important discovery of Acharya Agnivrat Naishthik. In this book he has proved in the very scientific and logical manner that the Vedic Chants are a form of vibrations, created in the fundamental substance of creation, which appears in the Para and Pashyanti form of the sound. It has been mentioned that the Vedic Chants are the form of very subtle vibrating entities. The modern physics, who talks about the creation of fundamental particles by the strings, in fact, the Vedic Chants are more subtle entities from those strings. The properties of these vibrating entities, the mechanism of their origin, how they create and operate the creation, how do all the celestial bodies from fundamental particles to the stars form and work, the solution of many questions of this creation like these, is an important and unique feature of this book.
The preface of this book, which is 420 pages, explains the Vedic creation theory while reviewing the creation theories of the modern science. In this, the scientific method of interpretation of Vedas and Brahmanical texts, which had disappeared after the Mahabharata period in the view of Acharya, is discovered with the help of God’s grace and the signs of the founder of Arya Samaj, Maharishi Dayanand Saraswati. In it, to illustrate the commentary of the other commentators of Vedas and other texts, he has shown these commentaries as an example through three types of genre of Vedic Chants to compare it to his interpretation.
After the Mahabharata period, all the social and religious evils, which Vedic religion had suffered, would also possible to be eradicated by explaining this book. In this way, this book will give far-reaching benefits in removing the social problems which have been afflicted with us since the time of middle age and which were arised by not properly understanding the scriptures of Vedas.
In this text, four Vedas, 94 texts including about 68 books of various Rishis and other Sanskrit texts, about 30 high-level texts of modern physics and research papers have been cited.
In short, this book will play an important role in proving, the direction of India’s ancient Vedic science and knowledge, beneficial for the entire mankind. By giving a new direction to modern physics, it will be able to make India Jagadguru in the field of theoretical physics. This book is in Hindi language. Shri Acharya Agnivrat Naishthik’s disciple Mr. Vishal Arya, who has done M.Sc. in Theoretical Physics (Cosmology, Astrophysics, Quantum Field Theory, Plasma Physics and String Theory) from University of Delhi, has edited this book. Sri Vaidic Swasti Pantha Trust, Bhagal-Bhim, Bhinmal, District-Jalore, Rajasthan, whose chairman is Shri Acharya Agnivrat Naishthik, has published this book.