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योगदर्शनम्

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ग्रन्थ का नाम – योग – दर्शनम् (व्यासभाष्यसहितम्)
व्याख्याकार – स्वामी सत्यपति परिव्राजक जी

वैदिक छह दर्शनों में योगदर्शन का अपना विशिष्ट स्थान है। इस दर्शन में योग का वास्तविक स्वरूप, योग का फल, योग के क्रियात्मक उपाय, योग के भेद और योग में उपस्थित होने वाले बाधकों का विस्तृत विवेचन किया गया है।

यदि हम योग के महत्त्व पर विचार करें तो हम जानते हैं कि सांसारिक वस्तुओं के साथ हमारा सम्बन्ध नित्य रहने वाला नहीं है। इन विषय भोगों को अधिकाधिक भोग कर कोई व्यक्ति पूर्ण व स्थायी सुःख प्राप्त नहीं कर सकता है। उपर्युक्त सत्य के समान यह भी अटल सत्य है कि ईश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध नित्य है। इस सम्बन्ध का कभी विच्छेद नहीं होता है। ऐसे ईश्वर को ही प्राप्त करके मनुष्य पूर्ण सुखी हो सकता है, अन्यथा नहीं।

स्थायी सुःख की प्राप्ति के लिये आज के मनुष्य ने घोर पुरुषार्थ किया है और करता भी जा रहा है। सारी पृथिवी का स्वरुप ही बदल डाला है। तदुपरान्त भी वह दुःखों की निवृत्ति और नित्य आनन्द प्राप्त नहीं कर पाया है। इसी प्रकार चलते रहने पर भविष्य में भी मुख्य लक्ष्य प्राप्ति की कोई संभावना नहीं है।

काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेषादि मानसिक रोगों का समाधान केवल धन – सम्पत्ति व भौत्तिक विज्ञान से कदापि सम्भव नहीं हो सकती है। इन मानसिक रोगों का समाधान तो आत्मा परमात्मा सम्बन्धी अध्यात्म विद्या को पढ़ने – पढ़ाने, सुनने – सुनानें और इसके क्रियात्मक रूप देने से ही सम्भव है, अन्यथा नहीं।

आज के हजारों भौत्तिक वैज्ञानिक तन, मन व धन से भौत्तिक विज्ञान के आविष्कारों में लगे हुये हैं और वे इसी से ही समस्त दुःखों की निवृत्ति और नित्यानन्द की प्राप्ति सिद्ध करना चाहते हैं परन्तु उन्होनें आत्मा – परमात्मा के विज्ञान तथा ईश्वर – प्राप्ति लक्ष्य का सर्वथा परित्याग कर दिया है। अत एव आज समस्त विश्व विविध दुःखों से अत्यन्त सन्तप्त है। जब तक आत्मा व परमात्मा का विज्ञान और ईश्वर – प्राप्ति लक्ष्य को स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक यह संसार दुःखसागर में गोते लगाता रहेगा।

यदि संक्षिप्त में विचार किया जावें तो प्रत्येक व्यक्ति समस्त दुःखों से छुटकर नित्यानन्द को प्राप्त करना चाहता है। जब तक व्यक्ति योगदर्शन में प्रतिपादित हेय, हेयहेतुः, हान और हानोपाय के स्वरूप को अच्छी प्रकार से नहीं जानता तब तक समस्त दुःखों की निवृत्ति और नित्य सुःख की प्राप्ति नहीं हो सकती है। अतः योग दर्शन नामक अध्यात्म विज्ञान को पढ़ना और उस पर विचार पूर्वक क्रियात्मक अभ्यास द्वारा मानसिक क्लेशों से निवृत्ति करनी चाहिये। योगाभ्यास से प्राप्त फलों के बारे में जानने से हम योगदर्शन के महत्त्व को समझ सकते हैं। इसके लिये योगदर्शन और उसके व्यासभाष्य का अध्ययन और उसका क्रियान्वयन करना अत्यन्त आवश्यक है। परिचात्मक दृष्टि से योग के कुछ फलों का विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जाता है –

योगदर्शनकार ने योग का वास्तविक स्वरूप बतलाते हुए कहा “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” चित्त की वृत्तियों को रोकना योग है। योग के अन्य फल निम्नलिखित है –
(1) जब व्यक्ति सम्प्रज्ञात योग का अभ्यास करते करते परिपक्व स्थिति को प्राप्त कर लेता है तब वह अनुभव करता है कि मैं समस्त क्लेशों से छूट गया हूँ और ये सांसारिक लोग दुःखों से पीड़ित हैं। बौद्धिक स्तर पर उसकी ऐसी स्थिति होती है जैसे कि पर्वत के शिखर पर खड़ा हुआ व्यक्ति भूमितल के लोगों से स्वयं को ऊपर देखता है वैसे ही योगी अपने को ज्ञान के स्तर पर संसार से ऊँचा उठा हुआ देखता है। स्वयं को क्लेशों से मुक्त देखकर उसके मन में एक तीव्र इच्छा होती है कि मैं संमस्त संसार के प्राणियों को समस्त क्लेशों से छुटकारा दिला दूँ।
(2) जब व्यक्ति असम्प्रज्ञात योग का अभ्यास करते करते ऊँची स्थिति को प्राप्त कर लेता है उस स्थिति में योग का क्या फल होता है वह योगदर्शनकार महर्षि पतञ्जलि जी ने बताया “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” अर्थात् जब योगी परिपक्व अवस्था में पहुँच जाता है, तब उसको अपने वास्तविक स्वरूप का विशेष ज्ञान और ईश्वर के वास्तविक स्वरूप का परिज्ञान होता है। उस अवस्था में अविद्या, अधर्म, कुसंस्कार व समस्त दुःखों की परिसमाप्ति और विद्या, धर्म, सुसंस्कार और नित्यानन्द की प्राप्ति होती है। इस स्थिति को प्राप्त होकर जीवात्मा जब ईश्वर की दृष्टि में मोक्ष का अधिकारी बन जाता है तब वह मोक्षरूपी नित्यानन्द का उपभोग करता है यह योग का प्रमुख फल है।
(3) यदि प्रत्येक व्यक्ति योग के मात्र दो ही अङ्गों यम और नियम का ही पूर्णतः निष्ठा के साथ पालन कर लेंवे तो इस समस्त संसार में शांति और धर्म की स्थापना हो जायेगी। संसार जिस आतंकवाद आदि समस्याओं से घिरा हुआ है उसका समाधान योग के दो अङ्गों को पालन से सम्भव है।
इन ऊंची उपलब्धियों के अतिरिक्त योग के अन्य भी फल है जिनमें से कुछ संक्षिप्तरूप में इस प्रकार हैं –

(1) मेधा बुद्धि की प्राप्ति – योगी को सत्यासत्य, धर्माधर्म, कर्त्तव्याकर्त्तव्य, नित्यानित्य सुःखदुःख आदि के यथार्थ स्वरूप को जनाने वाली बुद्धि की प्राप्ति होती है।
(2) तीव्र स्मृति की प्राप्ति – पढ़े – सुनें, अनुभव किये, विचारे हुए विषयों को शीघ्रता से पुनः उपस्थित करने में योगी समर्थ हो जाता है।
(3) एकाग्रता की प्राप्ति – योगी जिस किसी भी इच्छित विषय में चित्त को एकाग्र करना चाहता है, उस विषय में तत्काल ही अपने चित्त को एकाग्र कर लेता है।
(4) मन आदि इन्द्रियों पर नियंत्रण – शरीर, इन्द्रियों और मन पर योगी पूर्णरूपेण नियंत्रण कर लेता है और उनकों अधर्म से हटाकर धर्म की ओर चलाने में समर्थ हो जाता है। फिर उसको किसी भी प्रकार की चिन्ता, शोक, तनाव आदि अशान्त नहीं करते हैं और वह रोग, वियोग, अपमान, हानि, विश्वासघात, मृत्यु आदि से होनेवाले दुःखों को सरलता से सहन कर लेता है।
(5) काम, क्रोध, लोभ, अहंकार आदि से सम्बन्धित कुसंस्कारों को नष्ट करके योगी जितेन्द्रियता, करूणा, त्याग, विद्या तथा निरभिमानता आदि के शुभ संस्कारों को अर्जित कर लेता है।
(6) सकाम कर्मों को छोड़कर निष्कामकर्मी बन जाता है।
अतः इनका परिज्ञान करके प्रत्येक व्यक्ति को योगी बनने का पूर्ण प्रयास करना चाहिये। और ईश्वर आज्ञा का पालन करते हुए अन्यों को भी योगी बनाने का प्रयास करना चाहिए।

वर्तमान में योग – दर्शन पर अनेकों विद्वानों के विविध भाषाओं में व्याख्याएँ उपलब्ध हैं किन्तु इस व्याख्या का महत्त्व यह है कि इस व्याख्या के व्याख्याकार स्वयं भी एक उच्च कोटि के योगाभ्यासी हैं। उनके पास योगाभ्यास विषयक लगभग पचास वर्षों के अनुभव हैं, उन अनुभवों को भी प्रस्तुत व्याख्या में यत्र – तत्र लिखने का प्रयास किया गया है। विशेषकर तृतीय पाद के तीसरे सूत्र के भाष्य में योग विषयक अपनी कुछ अनुभूतियों का भी वर्णन किया गया है इसके अतिरिक्त इस भाष्य में अनेकों बातों का स्पष्टीकरण किया गया है जैसे कि –
(1) इस सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय ईश्वर करता है जीवात्माएँ नहीं कर सकतीं। सृष्टि की उत्पत्ति स्वयं नहीं हो सकती है। यह स्वरूप से अनादि भी नहीं है।
(2) चाहे कोई कितना भी सिद्ध योगी क्यों न हो, वह ईश्वरवत् सर्वज्ञ नहीं हो सकता और न ही वह सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय कर सकता है।
(3) योगदर्शन में वर्णित सिद्धियों पर विचार करके अपना मन्तव्य दिया है कि किस सिद्धि को मानना, किसको न मानना अथवा किस रूप में मानना और कितने अंश में मानना चाहिये।
(4) योगदर्शन के सूक्ष्म विषयों को सरल भाषा में समझाने का प्रयास किया है।
(5) योगाभ्यासी ईश्वर साक्षात्कार तक कैसे पहुँचे तथा योग का वास्तविक स्वरूप क्या है, इसको क्रिया रूप में समझाने का प्रयत्न किया है।
(6) ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को बतलाने और ईश्वर प्राप्ति करने के लिये अधिक बल दिया गया है।
(7) इसमें व्यासभाष्य के अनुवाद के साथ – साथ सम्पूर्ण भाष्य की विशेष व्याख्या न करते हुवे जिस अंश को स्पष्ट करना आवश्यक समझा है, उसको स्पष्ट किया है तथा जिस अंश को स्वामी दयानन्द सरस्वती जी कृत सत्यार्थ प्रकाश के तीसरे समुल्लास में जो सत्यासत्य को जानने के लिये पाँच प्रकार की परीक्षाएँ लिखी हैं, उनको आधार बनाकर अन्वेषण करने पर जिस अंश को प्रक्षिप्त समझा है, उसे ‘प्रक्षिप्त’ नाम से लिखा है।

प्रस्तुत व्याख्या का वैशिष्ट्य निम्न प्रकार हैं –
(1) यह व्याख्या सर्वथा मौलिक है। किसी का अनुवाद वा छाया नहीं है।
(2) यह व्याख्या मौलिक, निगूढ़ तत्त्वों को सरल शब्दों में बतलाकर मानव को योग की ओर मोड़नेवाला ग्रन्थ है। इसको पढ़ते समय ऐसा प्रतीत होता है कि व्याख्याकार अपने अनुभव की बात लिख रहे हैं। इसके लिए 1.21 सूत्रव्याख्या देखी जा सकती है।
(3) योगाभ्यास के लिए आवश्यक छोटे माने जाने वाले वास्तव में बहुत महत्त्वपूर्ण विषय अनेक हैं, जिन पर ध्यान न देने पर बहुत वर्षों तक की गई साधना व्यर्थ होती है, जैसे निद्रा।
उपासना के समय निद्रा नहीं आनी चाहिए। साधना करते समय यदि निद्रा आती है, आलस्य रहता है तो वर्षों तक साधना करने पर भी सफलता नहीं मिलती है। निद्रा का कारण क्या है जिसको दूर करके साधक देर तक उपासना में बैठ सके, इसको प्रत्येक योगजिज्ञासु साधक को जानना चाहिए। इसी दृष्टि से निद्रा के 16 कारण बतलाये, जिनके दूर करने से साधक उपासना काल में निद्रा से मुक्त होकर साधना में सफल हो सकता है। देखिए सूत्र 1.10
(4) महर्षि पतञ्जलि एवं व्यास के संक्षिप्त अभिप्राय की बहुत स्थानों पर विस्तृत व्याख्या की है।
(5) योग साधकों की चिन्तन करने की शैली कैसी हो, उनके मन्तव्य कैसे हों इनका स्थान – स्थान पर निर्देश है।
(6) ध्यान के विषय में योग जिज्ञासुओं की बहुत सारी भ्रान्तियाँ हैं। इसमें इनका समाधानपूर्वक ध्यान के वास्तविक स्वरूप का प्रतिपादन है।
(7) इस व्याख्या में बहुत सारे सूत्रों की अति महत्त्वपूर्ण विशद्, मनोहारी, व्यावहारिक व्याख्या की गई है। ऐसी व्याख्या किसी भी योगग्रन्थ में नहीं देखी गई है।
(8) तीव्र संवेग को, समाधि को शीघ्र प्राप्त करने के साधनों के रूप में सूत्रकार ने बतलाया है। इस पर प्रस्तुत व्याख्या बहुत महत्त्वपूर्ण विषयों को प्रस्तुत करती है।
(9) ईश्वरप्रणिधान समाधि का बहिरङ्ग ही होता है वा अन्तरङ्ग भी। इस विषय का विवरण प्रस्तुत व्याख्या में किया गया है।
जिसको पढ़कर साधक अपने ईश्वरप्रणिधान के स्वरूप को जानकर परिपूर्ण ईश्वरप्रणिधान की ओर अग्रसर होगा।
(10) प्राणायाम करने से ज्ञान पर होने वाला आवरण किस प्रकार नष्ट होता है यह वैज्ञानिक पद्धति से प्रतिपादित किया गया है।
(11) पांच प्रकार की सिद्धियों की सुन्दर उपपत्ति लिखी है। यह संदर्भ इस बात को सिद्ध करता है कि यह सिद्धि नितान्त स्वाभाविक, वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक है।
(12) जात्यान्तर परिणाम की सुन्दर व्याख्या है, सृष्टिक्रम के अनुकूल है। कहीं पर भी कृत्रिमता नहीं आई है।
(13) सूत्रव्याख्या में यथा सम्भव महर्षि दयानन्द के मन्तव्यों को भी दर्शाने का प्रयास किया गया है।
(14) भूतेन्द्रियों के धर्म, लक्षण, अवस्था परिमाणों के जानने से होने वाले लाभों का वर्णन किया गया है। यह लाभ अन्य व्याख्याओं में उपलब्ध नहीं हैं।

प्रस्तुत व्याख्या में पातञ्जल योगसूत्र तदुपरान्त, सूत्र का शब्दार्थ, पुनः सूत्रार्थ पश्चात् व्यास भाष्य फिर उसका आर्यभाषा में अनुवाद और योगार्थप्रकाश का क्रम रखा गया है।

आशा है कि ईश्वर उपासक और योगाभ्यासी जिज्ञासु इस योग व्याख्या से अत्यन्त लाभान्वित होंगे तथा योगाभ्यास द्वारा स्वयं का और संसार के लोगों का जीवन श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करेंगे।

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