Yog Darshan योगदर्शन पंडित राजवीर

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योग दर्शन का सामान्य परिचय
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– पण्डित राजवीर शास्त्री (पूर्व सम्पादक : दयानन्द सन्देश)

महर्षि पतञ्जलि रचित योग दर्शन में ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति का स्पष्टरूप से कथन किया गया है।

सांख्य और योग के सिद्धान्तों में पर्याप्त समता है।

इसमें ईश्वर का सत्य स्वरूप, मोक्ष प्राप्ति के उपाय तथा वैदिक उपासना पद्धति का विशेषरूप से वर्णन किया गया है।

योग किसे कहते है? जीव के बन्धन के कारण क्या है? योग साधक की विभिन्न स्थितियाँ तथा विभूतियाँ कौन-कौन-सी है? मन की वृत्तियाँ कौन-सी है? मन का सम्बन्ध कब तक पुरुष के साथ रहता है? चित्तवृत्तियों के निरोघ के क्या उपाय हैं? इत्यादि यौगिक विषयों का विस्तृत वर्णन किया गया है।

वर्तमान काल में आस्तिक जगत् में उपासना पद्धति के नाम पर जो पाखण्ड तथा परस्पर विरोधी परम्पराएँ प्रचलित हो रही हैं, वे उपासना योग की पद्धति के अनुकूल न होने से मिथ्या हैं।

देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की पूजा, देवी-जागरण, कब्रों की पूजा, उच्च स्वर से ईश्वर का आह्वान करना, घण्टा-घडियाल बजाकर ईश्वर की उपासना समझना, इत्यादि सभी मान्यतायें योग भ्रष्ट एवं योग से विमुख लोगों द्वारा चलाई गई हैं।

परमेश्वर के मुख्य नाम ओम् (प्रणव) का जाप न करके अन्य नामों से परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना अपूर्ण ही है।

योग दर्शन के अनुसार परमेश्वर का ध्यान बाह्य न होकर आन्तरिक ही होता है।

जब तक इन्द्रियाँ बाह्यमुखी होती हैं, तब तक परमेश्वर का ध्यान कदापि सम्भव नहीं है।

इसलिये ईश्वर की सच्ची भक्ति के लिये योग दर्शन एक अनुपम शास्त्र है।

योग दर्शन पर महर्षि व्यास का प्राचीन एवं प्रामाणिक भाष्य उपलब्ध होता है।