यजुर्वेद भाष्यम्

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यजुर्वेदभाष्यम् (प्रथमो भागः)
भाष्यकार – श्रीमद्दयानन्द सरस्वती जी

यज् धातु से यजुर्वेद शब्द की निष्पत्ति होती है। महर्षि पाणिनी ने यज् धातु के अर्थ देवपूजा-दान-संगतिकरण किये हैं। यजुर्वेद का मुख्य प्रतिपाद्य विषय ‘यज्ञ’ है। यज्ञ के विषय में शतपथ ब्राह्मणकार लिखते है – “यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म” अर्थात् श्रेष्ठ कर्मों को यज्ञ कहते है।

ऋग्वेद में ईश्वर ने गुण और गुणी के विज्ञान के प्रकाश के द्वारा सब पदार्थ प्रसिद्ध किये हैं, उन मनुष्यों को पदार्थों से जिस-जिस प्रकार यथायोग्य उपकार लेने के लिये क्रिया करनी चाहिए तथा उस क्रिया के जो-जो अङ्ग वा साधन है, वे सब यजुर्वेद में प्रकाशित किये हैं।

यजुर्वेद पर अनेकों भाष्यकारों ने भाष्य किये हैं, जिनमें से मुख्यतः स्कन्द स्वामी, वेंकटमाधव, भट गोविन्द, आनन्दतीर्थ, सायण, रावण, महीधर, उव्वट आदि है। इन सभी भाष्यकारों ने यजुर्वेद का भाष्य किया तथा भाष्य में मुख्यतः द्रव्य यज्ञों का ही प्रतिपादन किया है। सामान्य व्यवहारिक और आधिदैविक पक्षों की उपेक्षा की है। महर्षि दयानन्द जी ने अपने भाष्य में आधात्मिक, आधिदैविक और व्यवहारिक तीनों पक्षों को स्थान दिया है।

प्रस्तुत भाष्य “वैदिक पुस्तकालय” अजमेर (परोपकारिणी सभा) द्वारा प्रकाशित है। इस संस्करण की कुछ विशेषताएँ निम्न प्रकार है –
1) इसमें ऋषि दयानन्द के संस्कृत पदार्थ, अन्वय एवम् भावार्थ को रखा गया है जो कि अन्य प्रकाशित संस्करणों में अनुपलब्ध होता है।
2) यह संस्करण संशोधित संस्करण है।
3) हार्ड कवर और सुन्दर छपाई के साथ प्रकाशित है।

प्रस्तुत भाष्य चार खण्डों में प्रकाशित किया गया है जिनके प्रतिपाद्य विषय और विशेषताएँ निम्न प्रकार है –

यजुर्वेदभाष्यम् (प्रथमो भागः) –

प्रस्तुत भाग में यजुर्वेद का प्रथम अध्याय से दशमोध्याय तक भाष्य है। इसमें प्रथम चरण में यजुर्वेद का संक्षिप्त परिचय, प्रतिपाद्य मुख्य विषय और यजुर्वेदों की मन्त्र सङ्ख्या का उल्लेख ऋषि दयानन्द द्वारा किया गया है। तत्पश्चात् ऋषि, देवता, छन्द, स्वरों का उल्लेख किया गया है। मन्त्र के विषय का उल्लेख, शीर्षक रूप में मन्त्र भाष्य से पूर्व किया गया है। शीर्षक के पश्चात् मन्त्रों का पदच्छेद, संस्कृत पदार्थ, अन्वय, भावार्थ एवम् आर्य्य भाषानुवाद किया गया है।

प्रस्तुत भाग के प्रतिपाद्य विषय निम्न प्रकार है –
1) प्रथमोऽध्याय – इस अध्याय में मनुष्यों को शुद्ध कर्म के अनुष्ठान में आने वाले दोषों और शत्रुओं की निवृत्ति के उपाय बताएँ गये है। मनुष्यों को यज्ञक्रिया के फल को जानने, धर्म के अनुष्ठान में निर्भयता से स्थिर होने, सब के साथ मित्रता से वर्त्तने, वेदों से सब विद्याओं का ग्रहण करने और कराने का उपदेश दिया गया है।
2) द्वितीयोऽध्याय – इस अध्याय में निम्न उपदेश किये गये हैं – यज्ञ के साधनों को बनाने का, यज्ञों के फलों का, गमन के साधनों का, अग्नि के दूतपन का, आत्मा और इन्द्रियादि पदार्थों की शुद्धि का, पुरूषार्थ का सन्धान करने का, शत्रुओं के निवारण, द्वेष त्याग, अग्नि के उपयोग, वायु और अग्नि के परस्पर मिलाने का विज्ञान, पुरुषार्थ का ग्रहण, यज्ञ में होम किये हुए पदार्थों का तीनों लोक में जाने का, गृहस्थों के कर्तव्य, सत्य का आचरण और दुष्टों के निवारण का उपाय आदि विषयों पर इस अध्याय में उपदेश किया गया है।
3) तृतीयोऽध्याय – इस अध्याय में अग्निहोत्र आदि का वर्णन, अग्नि के स्वभाव वा अर्थ का प्रतिपादन, पृथिवी के भ्रमण का लक्षण, अग्नि शब्द से ईश्वर वा भौत्तिक अर्थ का प्रतिपादन, ईश्वर के उपस्थान, अग्नि का स्वरूपकथन, ईश्वर की प्रार्थना, उपासना वा इन दोनों का फल, ईश्वर के स्वभाव का प्रतिपादन, सूर्य्य की किरणों के कार्य का वर्णन, गृहस्थाश्रम के आवश्यक कार्यों के अनुष्ठान और लक्षण, इन्द्र और पवनों के कार्य का वर्णन, सत्य से लेन-देन आदि व्यवहार करना, ऋतुओं के स्वभाव का वर्णन, चार प्रकार के अन्तःकरण का लक्षण, रूद्र शब्द के अर्थ का प्रतिपादन, तीन सौ वर्ष की आयु आदि विषयों पर इस अध्याय में प्रकाश किया गया है।
4) चतुर्थोऽध्याय – इस अध्याय में शिल्प विद्या, वृष्टि की पवित्रता का सम्पादन, विद्वानों का सङ्ग, यज्ञ का अनुष्ठान, उत्साह आदि की प्राप्ति के उपाय, युद्ध विद्या, शिल्प विद्या के गुण, सत्यव्रत के लाभ, माता-पिता और पुत्रादिकों का आपस में अनुकरण, यज्ञ की व्याख्या, दिव्य बुद्धि की प्राप्ति के उपाय, सूर्य्य के गुण, पदार्थों के क्रय-विक्रय का उपदेश, चोर आदि के निवारण का उपाय आदि विषयों पर उपदेश किया गया है।
5) पञ्चमोऽध्याय – इस अध्याय में यज्ञ का अनुष्ठान, यज्ञ के स्वरूप का सम्पादन, विद्वान और परमात्मा की प्रार्थना, विद्या और विद्वान की व्याप्ति का निरूपण, अग्नि आदि पदार्थों से यज्ञ की सिद्धि, वाणी का व्याख्यान, अध्ययन और अध्यापन, योगाभ्यास का लक्षण, सृष्टि की उत्पत्ति, ईश्वर एवम् सूर्य्य के कर्म, प्राण और अपान की क्रिया, सूर्य और सभाध्यक्ष के गुण, शूरवीरों के गुण, दुष्टों से छुटने के उपाय आदि विद्याओं का प्रकाश किया है।
6) षष्ठोऽध्याय – इस अध्याय में राज्य के अभिषेकपूर्वक शिक्षा, राज्य का कृत्य, प्रजा को राजा का आश्रय, सभाध्यक्षादिकों के कार्य, विष्णु के परम पद, गुरू और शिष्यों के गुण, होम किये द्रव्य का वर्णन, विद्वानों के लक्षण, वीरों के उत्साहवर्धन के उपाय, राज्य प्रबन्ध के साध्य साधन, प्रजा एवम् सभापतियों के कर्तव्य कार्यों का निरूपण, पति-पत्नि के परस्पर बर्ताव आदि विषयों पर प्रकाश डाला गया है।
7) सप्तमोऽध्याय – इस अध्याय में मनुष्यों का परस्पर वर्त्ताव, आत्मा का कर्म्म, योगविद्या, गुरु-शिष्य का परस्पर व्यवहार, राजा के कर्तव्य, नित्य स्वाध्याय के लाभ, ब्रह्मचर्यपालन आदि विषयों का उपदेश किया है।
8) अष्टमोऽध्याय – इस अध्याय में ब्रह्मचारिणी कन्या के गुण, गृहस्थ धर्म का वर्णन, प्रजा और राज्य कर्मचारियों के कर्त्तव्यों का वर्णन आदि शिक्षाओं का निरुपण किया गया है।
9) नवमोऽध्याय – इस अध्याय में पूर्व अध्याय के विषयों का निरुपण किया है। इस अध्याय में राजधर्म का प्रतिपादन किया है।
10) दशमोऽध्याय – इस अध्याय की पूर्व अध्याय से संगीति जाननी चाहिए। इसमें राज्य विद्या का उपदेश किया गया है।
इतने विषय मुख्यतः प्रथम भाग में प्रकाशित किये गये हैं।

यजुर्वदभाष्यम् (द्वितीयो भागः) –

प्रस्तुत भाग में यजुर्वेद का भाष्य एकादश अध्याय से आरम्भ होकर विशोऽध्याय पर्यन्त है। इसमें पदच्छेदादि क्रम पूर्ववत् है।

इस भाग में अध्यायों के प्रतिपाद्य विषय निम्न प्रकार हैं –
1) एकादशोऽध्याय – इस अध्याय में गृहस्थ, राजा, सेनाध्यक्ष के करने योग्य कर्मों का वर्णन है।
2) द्वादशोऽध्याय – इस अध्याय में स्त्री, पुरुष, राजा, प्रजा, कृषि-विज्ञान, पठन-पाठन आदि कर्मों का वर्णन है।
3) त्रयोदशोऽध्याय – इस अध्याय में शुद्ध वाणी व्यवहारों के लाभों का वर्णन है। स्त्री, पुरूष और ईश्वर के व्यवहार का वर्णन इस अध्याय में किया गया है।
4) चतुर्दशोऽध्याय – इस अध्याय में औषधियों एवं चिकित्सा विज्ञान, वसन्तादि ऋतुओं के गुणधर्म, ईश्वरोपासना आदि विषयों का वर्णन है।
5) पञ्चदशोऽध्याय – इस अध्याय में ऋतुविद्या, अग्नि और वायु के कार्य, ऋतुविद्या आदि विषयों का प्रतिपादन है।
6) षोडशोऽध्याय – इस अध्याय में वैद्य के कर्तव्य, औषध विज्ञान, वायु, जीव, ईश्वर और वीर पुरुषों के गुण तथा कर्तव्यों का वर्णन है।
7) सप्तदशोऽध्याय – इस अध्याय में सूर्य्य, मेघ, गृहाश्रम और गणित की विद्या तथा ईश्वर आदि पदार्थों की विद्या का वर्णन किया गया है।
8) अष्टदशोऽध्याय – इस अध्याय में विद्युतादि से यन्त्र विद्या की सिद्धि, गणित-विद्या और युद्ध में मरे हुओं की सन्तान-स्त्री आदि के पालन का वर्णन आदि विद्याओं का उपदेश किया गया है।
9) एकोनविंशोऽध्याय – इस अध्याय में गौपालन के महत्त्व, सोमादि पदार्थों के गुणधर्म, सेनापति के कर्त्तव्य आदि विद्याओं का उपदेश है।
10) विशोऽध्याय – इस अध्याय में वैद्यक विद्या, धर्म के अङ्ग एवम् अङ्गी, ब्राह्मण और क्षत्रिय के कर्त्तव्य, स्त्रियों के गुण, धनादि पदार्थों की वृद्धि के उपाय आदि विषयों का वर्णन है।

यजुर्वेदभाष्यम् (तृतीयो भागः)

प्रस्तुत भाग में यजुर्वेद का भाष्य एकविशोऽध्याय से प्रारम्भ होकर त्रिशोऽध्याय पर्यन्त है। इसमें पदच्छेदादि क्रम व्यवस्था पूर्ववत् समझनी चाहिए।

इस भाग के अध्यायों का प्रतिपाद्य विषय निम्न प्रकार है –
1) एकविंशोऽध्याय – इस अध्याय में वरुण और अग्नि आदि पदार्थों की विद्या, शिल्पादि विद्या, ऋतुओं के अनुकूल व्यवहार आदि विषयों का निरूपण है।
2) द्वाविंशोऽध्याय – इस अध्याय में आयु वृद्धि के उपाय, अग्नि के गुण, कर्म, गायत्री मन्त्र का अर्थ, पदार्थों के शुद्धिकरण की विद्या आदि विषयों का वर्णन है।
3) त्रयोविंशोऽध्याय – इस अध्याय में सृष्टि के गुण, योग की प्रशंसा, राजा के गुण, रेखागणित आदि विद्याओं का उपदेश है।
4) चतुविशोऽध्याय – इस अध्याय में पशु-पक्षी, रिंगने वाले साँप, वनीय जन्तु, जलचर, कृमि आदि जीवों का उल्लेख है।
5) पञ्चविंशोऽध्याय – इस अध्याय में संसार के पदार्थों का वर्णन, पशुओं को सिखलाना, परमेश्वर से प्रार्थना, यज्ञ की प्रशंसा, बुद्धि प्राप्ति आदि विषयों का निरूपण किया गया है।
6) षड्विंशोऽध्याय – इस अध्याय में पुरुषार्थ का फल, सब मनुष्यों को वेद पढने-सुनने का अधिकार, अग्न्यादि पदार्थ, यज्ञ, सुन्दर घरों को बनाना आदि विषयों का निरूपण किया है।
7) सप्तविंशोऽध्याय – इस अध्याय में सत्य की प्रशंसा का जानना, उत्तम गुणों का स्वीकार, राज्य का विस्तार, अनिष्ट की निवृत्ति, सर्वत्र कीर्ति को बढाने के उपाय, अग्नि के गुण, वीर्य रक्षा के उपाय आदि का वर्णन है।
8) अष्टाविंशोऽध्याय – इस अध्याय में वाणी और अश्वियों के गुणों, होता के कर्त्तव्य, यज्ञ की व्याख्या आदि विषयों का वर्णन है।
9) एकोनत्रिशोऽध्याय – इस अध्याय में अग्नि, विद्वान, घर, प्राण, अपान, अध्यापक, वाणी, प्रशस्त पदार्थ, रात्रि, दिन, शिल्पी, सेना, सृष्टि के उपकारक कार्य, पशुओं के गुणों का निरूपण किया गया है।
10) त्रिंशोऽध्याय – इस अध्याय में परमेश्वर का स्वरूप और राजा के कृत्यों का वर्णन किया गया है।

यजुर्वेदभाष्यम् (चतुर्थो भागः)

प्रस्तुत भाग में यजुर्वेद का भाष्य एकत्रिंशोऽध्याय से चत्वारिंशोऽध्याय तक अर्थात् यजुर्वेद की समाप्ति तक है। इस भाग में पदच्छेदादि क्रम पूर्ववत् है।

इस भाग में जिन विषयों का समावेश किया गया है, वे निम्न प्रकार हैं –
1) एकत्रिंशोऽध्याय – इस अध्याय में ईश्वर, सृष्टि और राजा के गुणों का वर्णन है।
2) द्वात्रिंशोत्तमाऽध्याय – इस अध्याय में परमेश्वर, विद्वान, बुद्धि और धन की प्राप्ति के उपायों का वर्णन है।
3) त्रयस्त्रिंशोऽध्याय – इस अध्याय में अग्नि, प्राण, उदान, दिन, रात, सूर्य्य, अग्नि, राजा, ऐश्वर्य, उत्तम यान, विद्वान, लक्ष्मी, वैश्वानर, ईश्वर, इन्द्र, बुद्धि, वरूण, अश्वि, अन्न, सूर्य आदि के गुणों का वर्णन है।
4) चतुस्त्रिंशोऽध्याय – इस अध्याय में मन का लक्षण, शिक्षा, विद्या की इच्छा, कन्याओं का प्रबोध, चेतनता, बल और ऐश्वर्य वृद्धि के उपाय, सोम औषधि का लक्षण, परमेश्वर और सूर्य्य का वर्णन, ईश्वर के जगत् की रचना, अवस्था का बढाना, विद्वानों और प्राणों का लक्षण आदि विषय इस अध्याय में कहे गये हैं।
5) पञ्चत्रिंशाऽध्याय – इस अध्याय में व्यवहार, जीव की गति, जन्म मरण, सत्य आशीर्वाद, अग्नि और सत्य इच्छा आदि का व्याख्यान किया गया है।
6) षट्त्रिंशोऽध्याय – इस अध्याय में परमेश्वर से प्रार्थना, सबके सुख का भान, आपस में मित्रता की आवश्यकता, दिनचर्य्या का शोधन, धर्म का लक्षण, अवस्था का बढाना और परमेश्वर का जानना कहा है।
7) सप्तत्रिंशोऽध्याय – इस अध्याय में ईश्वर, योगी, सूर्य्य, पृथिवी, यज्ञ, सन्मार्ग, स्त्री, पति के गुण, युक्त आहार-विहार का अनुष्ठान कहा है।
8) अष्टात्रिंशोऽध्याय – इस अध्याय में सृष्टि में शुभगुणों का ग्रहण, अपना एवम् दूसरों का पोषण करना, धर्म का अनुष्ठान, सुखभोग के उपाय आदि का वर्णन है।
9) एकोनचत्वारिंशोऽध्याय – इस अध्याय में अन्त्येष्टि संस्कार का वर्णन है।
10) चत्वारिंशोऽध्याय – इस अध्याय में ईश्वर के निज नाम “ओम्” का वर्णन है। ईश्वर के गुणों, अधर्म का त्याग, अधर्माचरण की निन्दा, जड वस्तु की उपासना का निषेध, जड-चेतन दोनो का स्वरूप आदि का वर्णन है।

इस चार भागों में प्रकाशित यजुर्वेद भाष्य के अध्ययन से पाठकों के ज्ञान में वृद्धि होगी तथा अनेकों शङ्का का निष्कासन होगा। इन शिक्षाओं को व्यवहार में लाने से इहलोक और परलोक दोनो में सुःख प्राप्त होगा। अतः वेदों की शिक्षाओं को आत्मसाद् करने के लिए, इस संस्करण को अवश्य प्राप्त करें।