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वेदभाष्य (सम्पूर्ण) हिंदी (Four Vedas (Hindi)

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मनुष्य की विशिष्टता यह है कि वो ब्रह्माण्ड में अन्य जीवों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान है। उसे जीवन निर्वाह और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग हे तु ज्ञान की आवश्यकता होती है, किन्तु यह ज्ञान स्वाभाविक न हो कर यत्नसाध्य है। मनुष्य प्रारम्भिक ज्ञान अपने माता – पिता और गुरूजनों से सीखता है अतः मनुष्य को निमित्त ज्ञान की आवश्यकता होती है। इससे एक प्रश्न उठता है कि सृष्टि के आरम्भ में जब सर्गारम्भ में जो मनुष्य उत्पन्न हुए थे, उन्हें ज्ञान किसने दिया था? क्योंकि उस समय कोई उनका देहधारी पिता-माता या गुरू नहीं था। अतः उस समय भी कोई ऐसी सत्ता होना अपेक्षित है जो उन्हें ज्ञान दे सके, इसीलिए ईश्वर और ईश्वरीय ज्ञान की सत्ता अपेक्षित है। महर्षि पतञ्जलि ने इसीलिए ईश्वर को गुरूओं का गुरू कहा है – “स एषः पूर्वेषामपि गुरूः कालेनानवच्छेदात्”(यो.द.1.26)।
 
भारतीय मनीषा का चिरन्तन विश्वास है कि – वेद ईश्वरीय ज्ञान है। कोई ज्ञान ईश्वरप्रदत्त है या नहीं, इसकी निम्न कसौटी है –
1) वह ज्ञान ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव के अनुकूल हो।
2) सृष्टिक्रम के अनुकूल हो।
3) वह ज्ञान देशकाल की सीमाओं में आवद्ध न होकर मनुष्य मात्र के लिए एक समान उपयोगी हो।
4) किसी भी व्यक्ति, देश-काल का इतिहास वर्णित न हो।
 
इन सब कसौटियों पर वेद ही विश्व का एकमात्र ग्रन्थ है जो कि खरा उतरता है किन्तु वेद ज्ञान को समझने के लिए उसका अर्थ सहित चिंतन आवश्यक है। महर्षि यास्क ने निरूक्त में कहा है – “यदगृहीतविज्ञात निगदेनैव शब्द्यते |
अंगनाविव शुष्केधो न तज्ज्वलति कर्हिचित” – निरुक्त १/१८
अर्थात जो बिना अर्थ ज्ञान के उच्चारण किया जाता है। अग्निरहित अवस्था में जैसा सुखा ईधन है, वैसे ही वह भी है अर्थात् जलता नही है।
 
वेदों के अर्थों और ज्ञान को समझने के लिए, इस ज्ञान में प्रवेश के लिए वेदों के भाष्य अर्थात् व्याख्या की आवश्यकता है। वेद भाष्य करने के लिए निम्न शर्तों का होना आवश्यक है –
1) वेदभाष्य में ऋषि, देवता, छन्द और स्वरों को ध्यान में रखते हुए, वेदों का भाष्य हो।
2) वेदों के शब्द यौगिक है इसलिए उनकें व्याकरण, निरूक्त और ब्राह्मणग्रन्थों के द्वारा उचित निर्वचन रखने चाहिए।
3) वेदों के किए गए अर्थों में आपस में वदतु व्याघात दोष न हो।
4) अर्थ प्रकरण को भंग न करे।
ये वेदार्थ की कसौटी है।
 
प्रस्तुत वेदों के भाष्य परोपकारिणी सभा, अजमेर से प्रकाशित है। ये सब भाष्य उपरोक्त नियमों पर खरे उतरते हैं। इन भाष्यों की निम्न विशेषताएँ हैं –
1) इसमें स्वामी दयानन्द जी द्वारा किया गया, संस्कृत में पदार्थान्वय और भावार्थ सम्मलित है जो कि अन्य प्रकाशित संस्करणों में नहीं है।
2) पाठों को शुद्धतम करके रखा गया है।
3) इसमें आर्यमुनि जी कृत वेदों की भूमिका और उपसंहार को भी सम्मलित किया गया है जिसमें वेदों से सम्बन्धित अनेकों महत्त्वपूर्ण लेख है।
4) अथर्ववेद के भाष्य में मुख्य मुख्य काण्डों की पूर्व में भूमिका प्रस्तुत की गई है।
5) इनमें स्थान-स्थान पर सायण, महीधर और मैक्समूलर के भाष्यों की समीक्षा की गई है।
 
इन वेदभाष्यों में मुख्यतः जिन विषयों पर प्रकाश डाला है, वह निम्न प्रकार है –
 
ऋग्वेदभाष्यम् – यह भाष्य 13 खंडों में है। इसमें 7 वें मण्डल से 61 वें सूक्त तक का भाष्य स्वामी दयानन्द जी कृत है तथा शेष भाष्य आर्य्य मुनि जी और ब्रह्ममुनि जी रचित है।
जिनमें प्रमुख रूप से अग्नि विद्या, विमान विद्या, चिकित्सा विज्ञान, पवन और सूर्य ऊर्जा विज्ञान, गणित विद्या, राजनीति, सृष्टि रचना, अर्थशास्त्र, शिल्प विद्या, धातु विद्या, भूगर्भ विद्या, विद्युत विद्या आदि का वर्णन है। इन सब भौत्तिक विद्याओं के साथ-साथ आध्यात्मिक तथ्य और अन्य व्यवहारिक शिक्षाओं का भी ऋग्वेद में समावेश है।
 
यजुर्वेदभाष्यम् – यह भाष्य 4 खण्डों में है। यह सम्पूर्ण भाष्य स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा विरचित है। ऋग्वेद में ईश्वर ने गुण और गुणी के विज्ञान के प्रकाश के द्वारा सब पदार्थ प्रसिद्ध किये हैं, उन मनुष्यों को पदार्थों से जिस-जिस प्रकार यथायोग्य उपकार लेने के लिये क्रिया करनी चाहिए तथा उस क्रिया के जो-जो अङ्ग वा साधन है, वे सब यजुर्वेद में प्रकाशित किये हैं।
 
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वेदभाष्य (सम्पूर्ण) हिंदी (Four Vedas (Hindi)

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वेदभाष्य (सम्पूर्ण) हिंदी (Four Vedas (Hindi)

चारों वेदों का भाष्य आठ खंडों में –

भाष्यकारों के नाम –

ऋग्वेद – महर्षि दयानन्द सरस्वती (सातवें मंडल के 61वें सूक्त मन्त्र 2 पर्यन्त) पश्चात् – (सम्पूर्ण ऋग्वेद सात खंडों में) आर्यमुनि जी ने नवम मण्डल तक भाष्य किया है, दशम मण्डल का स्वामी ब्रह्ममुनि जी परिव्राजक ने किया है।

यजुर्वेद – महर्षि दयानन्द सरस्वती (40 अध्याय पर्यन्त) (सम्पूर्ण यजुर्वेद एक खंड में)

सामवेद – पं.रामनाथ वेदालङ्कार जी (सम्पूर्ण सामवेद एक खंड में)

अथर्ववेद – पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी जी (सम्पूर्ण अथर्ववेद दो खंडों में)

वेद संस्कृति, विज्ञान, शिक्षा के मूलाधार है। वेद विद्या के अक्षय भण्डार और ज्ञान के अगाध समुद्र है। संसार में जितना भी ज्ञान, विज्ञान, कलाएँ हैं, उन सबका आदिस्रोत वेद है। वेद में मानवता के आदर्शों का पूर्णरूपेण वर्णन है। सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों का पथ-प्रदर्शन वेदों के द्वारा ही हुआ था। वेद न केवल प्राचीन काल में उपयोगी थे अपितु सभी विद्याओं का मूल होने के कारण आज भी उपयोगी है और आगे भी होगें। मनुष्यों की बुद्धि को प्रबुद्ध करने के लिए उसे सृष्टि के आदि में परमात्मा द्वारा चार ऋषियों के माध्यम से वेद ज्ञान मिला। ये वेद चार हैं, जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद के नाम से जाने जाते हैं। हम इन चारों वेदों का संक्षिप्त परिचय देते हैं –

ऋग्वेद – इस वेद में तृण से ईश्वर पर्यन्त सब पदार्थों का विज्ञान बीज रूप में है। इस वेद में प्रमुख रूप से सामाजिक विज्ञान, विमान विद्या, सौर ऊर्जा, अग्नि विज्ञान, शिल्पकला, राजनीति विज्ञान, गणित शास्त्र, खगोल विज्ञान, दर्शन, व्यापार आदि विद्याओं का वर्णन हैं।

इस वेद पर ऋषि दयानन्द जी का 7वें मण्डल के 61 वें सूक्त के दूसरे मन्त्र तक भाष्य है। दैव-दुर्विपाक से ये भाष्य स्वामी दयानन्द जी द्वारा पूर्ण न हो सका। शेष भाग आर्यमुनि जी द्वारा किया गया हैं। ये भाष्य नैरूक्तिक शैली से परिपूर्ण होने के कारण वेदों के नित्यत्व को स्थापित करता है तथा युक्तियुक्त और सरल होने से अत्यन्त लाभकारी है।

ज्ञान स्वरूप परमात्मा प्रदत्त दूसरा वेद है –

यजुर्वेद – इस वेद की प्रशंसा करते हुए, फ्रांस के विद्वान वाल्टेयर ने कहा था – “इस बहुमूल्य देन के लिए पश्चिम पूर्व का सदा ऋणी रहेगा।

यज्ञों पर प्रकाश करने से इस वेद को यज्ञवेद भी कहते हैं। इस वेद में यज्ञ अर्थात् श्रेष्ठकर्म करने की और मानवजीवन को सफल बनाने की शिक्षा दी गई है। जो कि पहले ही मन्त्र – “सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे” के द्वारा दी गई है। इस वेद में धर्मनीति, समाजनीति, अर्थनीति, शिल्प, कला-कौशल, ज्यामितीय गणित, यज्ञ विज्ञान, भाषा विज्ञान, स्मार्त और श्रौत कर्मों का ज्ञान दिया हुआ है। इस वेद का चालीसवाँ अध्याय अध्यात्मिक तत्वों से परिपूर्ण है। यह अध्याय ईशावस्योपनिषद् के नाम से प्रसिद्ध है।

इस वेद पर ऋषि दयानन्द का सम्पूर्ण भाष्य है। महर्षि का भाष्य अपूर्व एवं अनूठा है। उव्वट और महीधर के भाष्य इतने अश्लील हैं कि उनहें सभ्य-समाज के समक्ष बैठकर पढा नहीं जा सकता है, इसके विपरीत महर्षि का भाष्य इस अश्लीलता से सर्वथा रहित है। महर्षि दयानन्द का भाष्य वैदिक सत्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है तथा मनुष्य के दैनिक कर्त्तव्यों का सन्देश और उपदेश देता है।

इस वेद के पश्चात् सामवेद का लघु परिचय देते हैं –

ये वेद आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है, परन्तु महत्व की दृष्टि से अन्य वेदों के समान ही है। इस वेद में उच्चकोटि के आध्यात्मिक तत्वों का विशद वर्णन है, जिनपर आचरण करने से मनुष्य अपने जीवन के चरम लक्ष्य प्रभु-दर्शन की प्राप्ति कर सकता है।

इस वेद द्वारा संगीतशास्त्र का विकास हुआ है। इस वेद में आध्यात्मिक विषय के साथ-साथ संगीत, कला, गणित विद्या, योग विद्या, मनुष्यों के कर्तव्यों का वर्णन है। छान्दोग्य उपनिषद् में “सामवेद एव पुष्पम्” कहकर इसकी महत्ता का प्रतिपादन किया है।

इस वेद पर ऋषि दयानन्द का भाष्य नही है लेकिन उनहीं की शैली का अनुसरण करते हुए पं.रामनाथ वेदालङ्कार जी का भाष्य है। यह भाष्य संस्कृत और आर्यभाषा दोनो में है। इस भाष्य में संस्कृत-पदार्थ भी आर्यभाषा-पदार्थ के समान सान्वय दिया है। इसमें प्रत्येक दशति के पश्चात् उसकी पूर्व दशति से संगीति दर्शायी है। अध्यात्म उपदेश से पृथक् इस भाष्य में राजा-प्रजा, आचार्य-शिष्य, भौतिक सूर्य, भौतिक अग्नि, आयुर्वेद, शिल्प आदि व्यवहारिक उपदेशों का दर्शन भी किया जा सकता है।

इस वेद के पश्चात् अथर्ववेद का परिचय देते हैं –

इस वेद में ज्ञान, कर्म, उपासना का सम्मिश्रण है। इसमें जहाँ प्राकृतिक रहस्यों का उद्घाटन है, वहीं गूढ आध्यात्मिक रहस्यों का भी विवेचन है। अथर्ववेद जीवन संग्राम में सफलता प्राप्त करने के उपाय बताता है। इस वेद में गहन मनोविज्ञान है। राष्ट्र और विश्व में किस प्रकार से शान्ति रह सकती है, उन उपायों का वर्णन है। इस वेद में नक्षत्र-विद्या, गणित-विद्या, विष-चिकित्सा, जन्तु-विज्ञान, शस्त्र-विद्या, शिल्प-विद्या, धातु-विज्ञान, स्वपन-विज्ञान, अर्थनीति आदि अनेकों विद्याओं का प्रकाश है।

इस वेद पर प्रसिद्ध पं.क्षेमकरणदास जी त्रिवेदी द्वारा रचित भाष्य है। इसमें पदक्रम, पदार्थ और अन्वय सहित आर्यभाषा में अर्थ किया गया है। अर्थ को सरल और रोचक रखा गया है। स्पष्टता और संक्षेप के ध्यान से भाष्य का क्रम यह रक्खा है –

1 देवता, छन्द, उपदेश।

2 मूलमन्त्र – स्वरसहित।

3 पदपाठ – स्वरसहित।

4 सान्वय भावार्थ।

5 भाषार्थ।

6 आवश्यक टिप्पणी, संहिता पाठान्तर, अनुरूप विषय और वेदों में मन्त्र का पता आदि विवरण।

7 शब्दार्थ व्याकरणादि प्रक्रिया-व्याकरण, निघण्टु, निरूक्त, पर्याय आदि।

इस तरह ये चारों वेदों का समुच्चय है। आशा है कि आप सब इस वेद समुच्चय को मंगवाकर, अध्ययन और मनन से अपने जीवन में उन्नति करेंगे।

वेद ऋषि से प्राप्त करें निम्न पुस्तकें |

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Additional Information

Weight10.590 kg
Dimensions8353 × 5.54 cm