वैशेषिक दर्शन

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ग्रन्थ का नाम – वैशेषिक दर्शन

भाष्यकार – आचार्य उदयवीर शास्त्री

वैशेषिक दर्शन के प्रणेता महर्षि कणाद हैं। इस ग्रन्थ में दस अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय में दो-दो आह्निक और 370 सूत्र है। इस दर्शन का प्रमुख उद्देश्य निःश्रेयस की प्राप्ति है।

वैशेषिक का अर्थ है – “विशेषं पदार्थमधिकृत्य कृतं शास्त्रं वैशेषिकम्”  अर्थात् विशेष नामक पदार्थ को मूल मानकर प्रवृत्त होने के कारण इस शास्त्र का नाम वैशेषिक है।

यह छह पदार्थ द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय मानता है।

द्रव्यों की संख्या नौ मानता है – पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन।

चौबीस गुण स्पर्श, रस, रूप, गन्ध, शब्द, संख्या, विभाग, संयोग, परिणाम, पार्थक्य, परत्व, अपरत्व, बुद्धि, सुःख, दुःख, इच्छा, द्वेष, धर्म, अधर्म, प्रयत्न, संस्कार, स्नेह, गुरुत्व और द्रव्यत्व हैं।

कर्मों के पाँच प्रकार उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुञ्चन, प्रसारण और गमन माने गये हैं।

सामान्य दो प्रकार का होता है – सत्ता सामान्य और विशिष्ट सामान्य, ऐसा इस दर्शन में माना गया है।

इस दर्शन के मूलभूत सिद्धान्त निम्न हैं –

परमाणु – जगत का मूल उपादान कारण परमाणु माना है और परमाणुओं के संयोग से अनेक वस्तुएँ बनती हैं।

अनेकात्मवाद – यह दर्शन जीवात्माओं को अनेक मानता है तथा कर्मफल भोग के लिए अलग-अलग शरीर मानता है।

असत्कार्यवाद – इस दर्शन का सिद्धान्त है कि कारण से कार्य होता है। कारण नित्य हैं और कार्य अनित्य।

 

मोक्षवाद – आवागमन के चक्र से मुक्त हो, जीव का परम् लक्ष्य मोक्ष मानता है।

 

इस दर्शन में भूकम्प आना, वर्षा होना, चुम्बक में गति, गुरुत्वाकर्षण विज्ञान, ध्वनि तरंगे आदि के विषय में विवेचना प्रस्तुत की गई है।

 

प्रस्तुत भाष्य आचार्य श्री उदयवीर शास्त्री जी द्वारा किया गया है। यह किसी मध्यकालीन भाष्यकार का अनुसरण नहीं करता है। इस भाष्य में शास्त्रीय सिद्धान्तों को यथामति समझकर व आत्मसात् कर सूत्रपदों के अनुसार प्रसंग की उपेक्षा व अवेहलना न करते हुए सैद्धान्तिक परम्परा का पालन करने का यथाशक्ति ध्यान रखा गया है। सूत्रव्याख्या में सावधानीपूर्वक उस मार्ग को अपनाया गया है, जिसके अनुसार सूत्रकार द्वारा प्रयुक्त ‘धर्म’ पद की शास्त्रीय सिद्धान्तों के अनुसार यथार्थ व्याख्या का उद्भावन सम्भव हो।

यह भाष्य आर्यभाषा में होने के कारण संस्कृतानभिज्ञ लोगों के लिए भी लाभकारी है।

 

वैशेषिक दर्शन का सामान्य परिचय
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– पण्डित राजवीर शास्त्री (पूर्व सम्पादक : दयानन्द सन्देश)

महर्षि कणाद रचित इस दर्शन में धर्म के सच्चे स्वरूप का कथन किया गया है।

इसमें सांसारिक उन्नति तथा निश्श्रेयस सिद्धि के साधन को धर्म माना गया है।

अत: मानव के कल्याण के लिये तथा पुरुषार्य चतुष्टय की सिद्धि के लिये धर्म का अनुष्ठान करना परमावश्यक माना गया है।

धर्म के इस सत्य स्वरूप को न समझकर मतमतान्तर वालों ने जो संसार में धर्म के नाम पर बाह्याडम्बर बना रखा है, और वे पारस्परिक विद्वेषाग्नि से झुलस रहे हैं, उसका समूल निराकरण धर्म के सत्य स्वरूप को समझने से हो जाता है।

इस दर्शन में द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय, इन छ: पदार्थों के साधर्म्य तथा वैधर्म्य के तत्त्वज्ञान से मोक्ष प्राप्ति मानी है।

इस दर्शन की यह साधर्म्य-वैधर्म्य ज्ञान की एक विशेष पद्धति है, जिसको न जानने से भ्रान्तियों का निराकरण करना सम्भव नहीं है और वेदादि-शास्त्रों को समझने में भी अत्यधिक भ्रान्तियाँ उत्पन्न होती हैं।

जैसे किसी नवीन वेदान्ती ने अद्वैतवाद को सिद्ध करने के लिए कह दिया – ‘जीवो ब्रह्मैव चेतनत्वात्’ अर्थात् चेतन होने से जीव तथा ब्रह्म एक ही हैं। परन्तु इस मान्यता का खण्डन साधर्म्य-वैधर्म्य से हो जाता है।

यद्यपि ब्रह्म-जीव दोनों ही चेतन हैं, किन्तु इस साधर्म्य से दोनों एक नहीं हो सकते। इनके विशेष धर्म इनके भेदक होते हैं।

जैसे – चार पैर मात्र होने से गाय-भैंस एक नहीं हो सकते। ब्रह्म के विशेष धर्म हैं – सर्वत्र व्यापक, सर्वज्ञ, सृष्टिकर्त्तादि और जीव के विशेष धर्म हैं – परिच्छिन्न, अल्पज्ञ, भोक्ता इत्यादि।

इसी प्रकार प्रकृति आदि पंचमहाभूत विशेष धर्मों के कारण ही भिन्न-भिन्न कहलाते हैं।

इस दर्शन की सूक्ष्म पदार्थों के स्वरूप को समझाने वाली पद्धति को न जानने से ही वेदान्त दर्शन के सूत्रों की व्याख्या में अत्यधिक भ्रान्तियाँ उत्पन्न हुईं।

ब्रह्म जगत् का उपादान कारण है अथवा निमित्त कारण? इस भ्रान्ति का निराकरण इस दर्शन के ‘कारणगुणपूर्वक: कार्यगुणो दृष्ट:’ अर्थात् कारण के गुण कार्य में होते हैं, इस नियम को समझने से भलीभाँति हो जाता है।

इस दर्शन की कसौटी पर परीक्षा करने पर अद्वैतवादादि मिथ्यावाद स्वत: ही धराशायी हो जाते हैं।

यह दर्शन वेदोक्त धर्म की ही व्याख्या करता है।

इस दर्शन में वेदों को ईश्वरोक्त होने से परम प्रमाण माना गया है।

इस दर्शन के सूत्रों पर प्राचीन ‘प्रशस्त पाद भाष्य’ उपलब्ध होता है।

[स्रोत : पातञ्जल योग दर्शन भाष्यम्, प्राक्कथन, पृ. 11-12, प्रस्तुति : भावेश मेरजा]