सन्तान साधना Santaan sadhanaa

पुस्तक का नाम – सन्तान साधना

लेखक का नाम – विजेन्द्र आर्य

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पुस्तक का नाम – सन्तान साधना
 
लेखक का नाम – विजेन्द्र आर्य
 
व्यक्ति की सर्वांगिण उन्नति के लिये ऋषियों ने चार आश्रमों का विधान किया है। इनमें गृहस्थाश्रम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस आश्रम का प्रारम्भ आर्षोक्त विवाह पद्धति के पश्चात् होती है। इस आश्रम का उद्देश्य परिवार की खुशहाली के साथ – साथ राष्ट्र और धर्म के लिए अपनी सन्तानों का निर्माण करना है। सन्तानों को चरित्रवान बनाने के लिए इसी आश्रम के अन्तर्गत ऋषियों ने संस्कारों का विधान किया है, ये संस्कार अपने मनोवैज्ञानिक प्रभावों के कारण सन्तानों में सकारात्मकता और चारित्रिक ऊर्जा का प्रसारण करते है। जिससे सन्तान में दैवीय गुण या दैवीय सत्व का विकास होता है। सन्तान को संस्कारित बनाने की प्रक्रिया उनके गर्भकाल अर्थात् भ्रूणावस्था से ही प्रारम्भ हो जाती है। इसके लिए सन्तान के जनक – जननी को भी स्वयं के विचारों को उच्च करना आवश्यक है क्योंकि गर्भावस्था में भ्रूण जननी का ही एक शरीर के अंग की तरह होता है। इस समय जननी यदि उच्च विचारवान महापुरुषों तथा सत्य साहित्य का स्वाध्याय करेगी तो इसका प्रभाव सन्तान पर होगा। यदि माता फिल्मों और कुसाहित्य का अध्ययन करेगी तो इसका दुष्प्रभाव सन्तान पर होगा अतः इस ओर सन्तान के माता – पिता को ध्यान देने की आवश्यकता है। इसी तरह बालक के शारीरिक विकास के लिए भी जननी को गर्भावस्था में खान – पान का भी ध्यान देना आवश्यक है। सन्तान की उन्नति और सर्वांगिण विकास के लिए माता – पिता क्या – क्या करें और कौन – कौन से संस्कार उनके लिए आवश्यक है तथा उन संस्कारों के क्या प्रभाव पढ़ते है, इसका ज्ञान अधिकतर माता – पिता को न होने के कारण वे चाह कर भी अपनी सन्तान को सन्मार्ग की ओर लाने में असफल रहते है। सन्तान निर्माण कैसे करें, इसके लिए प्रस्तुत पुस्तक “सन्तान साधना” की रचना की गई है।
 
सन्तान को दुष्प्रभाव से बचाने और उन्हे सन्मार्ग की ओर प्रेरित करने वाली भारतीय ऋषियों की संस्कार पद्धति की व्याख्या और समीक्षा प्रस्तुत पुस्तक में की गई है। इस पुस्तक में सन्तान की उत्पत्ति से पूर्व माता – पिता के कर्त्तव्यों का वर्णन किया गया है। ,सन्तान की शारीरिक उन्नति के लिए औषधियों और खान – पान का वर्णन प्रस्तुत पुस्तक में किया गया है। रोगोपचारक यज्ञों और उनके महत्त्व को भी पुस्तक में दर्शाया गया है। शिशु के रोगी हो जाने पर आयुर्वेदिक उपचार के साथ – साथ अति आवश्यक होने पर ऐलौपेथी की भी औषधियों का निर्देश पुस्तक में यथा स्थान किया गया है। बालकों के अंगों की सुरक्षा और साफ – सफाई करने की विधियों का भी उल्लेख किया गया है। घर में बालक को किस – किस विषय की कैसे शिक्षा देनी है इसका वर्णन महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की पद्धति के अनुसार किया गया है। सन्तान की आर्थिक और चारत्रिक दोनो उन्नति साथ – साथ हो, इसके लिए किस प्रकार की शिक्षा देना आवश्यक है इसका विवरण पुस्तक में किया गया है। सन्तान की धार्मिक और विज्ञान सम्बन्धित जिज्ञासाओं को जगाने के उपायों तथा उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करके उन्हे तार्किक तथा विवेकशील बनाने के उपायों को पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है। जिससे बालक जीवन में कभी भी किसी भी प्रकार अंधविश्वासों से पृथक रहेंगे।
 
यह पुस्तक गृहस्थों के लिए एक मार्गदर्शक है। गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने वालों तथा प्रवेश कर चुके दोनों प्रकार के लोगों के लिए यह पुस्तक अत्यन्त आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण है। इस पुस्तक के द्वारा पाठक सन्तान निर्माण की दार्शनिक और वैज्ञानिक पद्धति को जान सकेंगे तथा इस पद्धति के द्वारा ऐसी सन्तान के निर्माण में सक्षम हो सकेंगे जो राष्ट्र एवं धर्म की उन्नति करेंगे।
 
 
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