सांख्य सिद्धांत

Author :
Ach.Udaiveer Shastri
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The author has attempted to remove all misconceptions regarding history and evolution of this philosophy. Pages: 704, Size: 14 cms × 22 cms

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पुस्तक का नाम – सांख्य दर्शन का इतिहास

लेखक – आचार्य उदयवीर शास्त्री

भारतीय दर्शनों में सांख्य दर्शन का महत्व अद्वितीय हैं। न केवल अपनी अत्यंत प्राचीनता के कारण ही, न केवल भारतीय वाङ्मय, विचारधारा पर अपने अमित छाप छोड़ने के कारण ही, किन्तु वास्तविक अर्थों में किसी भी दार्शनिक प्रस्थान के लिए आवश्यक गहरी आध्यात्मिक दृष्टि के कारण भी इसका महत्व अति स्पष्ट हैं।

 

सांख्य प्रवर्तक कपिल के लिए “ऋषि प्रसूत कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानेर्विभर्ति” (श्वेता.उप. ५/२) जैसा वर्णन स्पष्ट हैं उससे इस दर्शन की प्राचीनता को सिद्ध होती हैं।

किन्तु पाश्चात्य विद्वान, वामपंथी इतिहासकार, अन्य इतिहास कार इस दर्शन और कपिल को अर्वाचीन बौद्ध काल के बाद का सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। इन सबके दिए तर्कों, तथ्यों का लेखक ने सप्रमाण, युक्तियुक्त खंडन किया हैं। लेखक ने यह प्रबल स्थापना की हैं कि जिन शब्दों और सिद्धांतों से इसके बुद्ध आदि काल के बाद की कल्पना की जाती हैं वे या तो आधुनिक व्याख्याकारों के संशय के कारण से उत्पन्न भ्रान्तियाँ है या फिर कुछ सूत्र प्रक्षिप्त हैं। प्रक्षिप्त सूत्रों का सकारण विवेचन भी लेखक ने किया हैं। यह पुस्तक आठ अध्यायों में विभक्त है इसकी विषयवस्तु निम्न हैं –

 

१ महर्षि कपिल

२ कपिल प्रणीत षष्टितन्त्र

३ षष्टितन्त्र तथा सांख्यषडाध्यायी

४ वर्तमान सांख्य सूत्रों के उद्धरण

५ सांख्य षडाध्यायी की रचना

६ सांख्यसूत्रों के व्याख्याकार

७ सांख्यसप्तति के व्याख्याकार

८ अन्य प्राचीन सांख्याचार्य

 

प्रस्तुत पुस्तक में सांख्य साहित्य के क्रमिक इतिहास की दृष्टि से लेखक ने अपने विचारों का विद्वतापूर्ण शैली में निरूपण किया हैं। इस ग्रन्थ की उपयोगिता एवम् उपादेयता असंदिग्ध हैं। यह ग्रन्थ अनेकों भ्रांतियों का निवारण करने वाला और दार्शनिक शोध कार्य करने वालों के लिए अति लाभप्रदत्त हैं।