समरांगण सूत्रधार

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समरांगण सूत्रधार ( दो भागो में )

लेखक – श्रीकृष्ण “जुगनू”

 

दस बरस तक लगकर 83 अध्याय व् करीब 8000 श्लोक वाले इस ग्रन्थ के लगभग हर विषय की परंपरा को खोजा, हर सन्दर्भ को टटोला और सिद्ध किया कि भारतीय विज्ञान के उत्कर्ष को बताने के लिये यह एक ही ग्रन्थ काफी है। यह तकनीक का नियमन और मानवीय आवश्यकता का रूपायन करता है।

इसे केवल वास्तु का ग्रन्थ कहना नासमझी है, 10वीं सदी तक के लोकोपयोगी रसायन शास्त्र, यंत्र विद्या, रत्न, धातु, वनस्पति… शताधिक अनुशासन इसमें आ जाते है। इसमें आतंक से प्रथमतः सावधानी बरतने और तकनीकी ज्ञान के अदेय का निर्देश है। भोज के बसाये भोपाल में अब इस ग्रन्थ पर जो विशिष्ट शोध हो रहा है, उसकी सूचना स्वयं वहां के कुलपतिजी ने सार्वजनिक दी। मैंने कहा था कि अभी तो मैं स्वयं इस पर इतना ही बड़ा काम करने का इच्छुक हूँ। यह ग्रन्थ विदेशों में भी पहुँच चुका है और अगले कई सालों तक इसमें वर्णित विगत पर काम होगा।

मित्रों को बताना चाहूंगा कि हाल ही मेरे इस ग्रन्थ का दूसरा विशिष्ट संस्करण चौखम्बा संस्कृत सीरीज़ ऑफिस, वाराणसी ने जारी किया है। मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूँ कि जितना इसे मूल रूप में रचा गया, उससे अधिक मैंने अपनी पाद टिप्पणियां देकर कहीँ विषय को सरल बनाया तो कहीं जटिल भी, ताकि इस पर और काम हो सके।

 

 

राजा भोज के समरांगण सूत्रधार ग्रन्थ में स्त्री पुरुष प्रतिमा यंत्र (रोबट ) का उलेख-
रोबट एक मशीन होता है जो बनावट में मनुष्य सदृश्य होता है चाइना ,जापान जैसे देश तो रोबट विकसित करने में लग गये है हमारी काफी शास्त्र सम्पदा नष्ट हो गई अन्यथा ये सब चीज़े हमारे शास्त्रों में थी अभी भी कई बचे हुए शास्त्रों में संकेत मात्र मिल जाते है राजा भोज के समय विश्वकर्मा मुनि का कोई ग्रन्थ होगा जिससे उन्होंने इस विद्या का उलेख किया है लेकिन यहा विधि नही दी इससे स्पष्ट है कि रोबट का उलेख उनसे पूर्व के किसी ग्रन्थ में अवश्य था राजा भोज ने उसका संक्षिप्त महत्व प्रतिपादित कर दिया |
अब ग्रन्थ में आये रोबट अर्थात यंत्र मानव का उलेख देखते है –
” अथ दासादि परिजनवर्गेर्विना तत्कृत्याना सर्वेशा यथावन्निर्वहणाय कल्पितस्य स्त्रीपुरुषप्रतिमायन्त्र घटना –
अर्थात घर पर सेवक और परिजन न हो तो कार्य सम्पादन हेतु स्त्री पुरुष प्रतिमा यंत्र (रोबट ) का उलेख करते है –
” दृगग्रीवातलहस्तप्रकोष्ठबाहूरुहस्तशाखादि |
सच्छिद्र वपुरखिल तत्सन्धिषु खंडशो घटयेत् || -समरांगण सूत्रधार ३१/१०१
अर्थात ऐसे यंत्र मानव का निर्माण करे आँख ,गर्दन , तल-हस्त ,प्रकोष्ठ ,बाहु ,उरु , हस्त -शाखा अर्थात उंगलिया भी हो | इस प्रकार की देहयष्टि में यंत्र मानव को पूरे देहान्तर्गत आवश्यक छिद्रों एवं अंगो की संधियों और विभिन्न खंडो की भी घड़ाई करनी चाहिए |
” शिलिष्ट कीलकविधिना दारुमय सृष्टचर्मणा गुप्तं |
पुंसोsथवा युवत्या रूपं कृत्वातिरमणीयम् ||
रन्ध्रगते: प्रत्यंग विधिना नाराचसगते: सूत्रे: – समरांगण सूत्रधार ३१/१०२
अर्थात अंगो के संयोजन में प्रयुक्त कीले को बहुत ही चिकनाई वाला बनाये और सविधि लगाये ,यह रचना काष्ठमय होगी किन्तु उस पर चमडा मढ़ कर नर नारी मय रूप दिया जायेगा | यह रूप अतीव रमणीय करना चाहिए | इस काया निर्माण के बाद उसके उसके रन्धो में जाने वाली शलाकाओ को सूत्रत: संयोजित किया जाना चाहिए |
” ग्रीवाचलनप्रसरणविकुज्चनादीनि विदधाति |
करग्रहणाताम्बुलप्रदानजलसेचनप्रणामादि || – समरांगण सूत्रधार ३१/१०३
अर्थात ऐसे विधान पूर्वक बनाया गया यंत्र मानव ग्रीवा को चलाता है ,हाथो को फैलता समेटता है अर्थात ऐसे विचित्र कौतुहल करता है यही नही वो ताम्बुल की मनुहार करता देता है , जल की सिचाई करता है और नमस्कार भी करता है |
” आदर्शप्रतिलोकनवीणावाद्यादि च करोति |
एवमन्यद्पि चेद्दशमेतत कर्म विस्मयविधायि विधत्ते ||
जृम्भितेन विधिना निजबुद्धे: कृष्टमुक्तगुणचक्रवशेन || -समरांगण सूत्रधार ३१/१०४ -१०५
अर्थात वह यंत्र मानव आने वालो को शीशा दिखाता है ,वीणा आदि वाद्य बजाता है | ये सारे ही कार्य यंत्र ही पूरे करता है | इस प्रकार पूर्व में कहे हुए गुणों के वशीभूत होकर चक्रीय विधि के अनुसार संचालक की बुद्धि के अनुसार प्रदर्शन करने लगता है |
यांत्रिक दरबान का उलेख –
” अनभिमतजनप्रवेशनिरोधनाय द्वारदेशे स्थापनीय द्वारपालयंत्र –
गृहार्थ द्वारपाल का वर्णन –
” पुंसो दारुजमुर्ध्व रूपं कृत्वा निकेतनद्वारि |
तत्करयोजित दंड निरुणद्धि प्रविशता वर्म्त || -समरांगण सूत्रधार ३१ /१०६
लकड़ी के बनाये यंत्र मानव के हाथ में एक दंड रखे उसे घर के बाहर खड़ा करे ताकि यह अनाधिकार चेष्टा कर घर में घुसने वालो को रोकेगा |
खड्गहस्तमथ मुद्ररहस्त कुंतहस्तमथवा यदि तत् स्यात |
तन्निहन्ति विशतो निशि चौरान द्वारि संवृतमुख प्रसभेन || समरांगण सूत्रधार ३१/१०७
यदि उक्त काष्ठ रचित यंत्र मानव के हाथ में तलवार ,मुद्गर ,भाला प्रदान कर देंवे तो वह रात्रि में प्रवेश करने वाले चोरो और अपना मुख छुपा कर आने वाले घुसपेठियो को मार सकता है |
इस तरह रोबट का उलेख महाभारत और कालिदास रचित रघुवंश की मल्लिनाथ की टीका में भी है |