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ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका

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ग्रन्थ का नाम – ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका
सम्पादक का नाम – प्रो. ज्ञानप्रकाश शास्त्री जी

वेदों के सम्बन्ध में विगत कुछ कालों में लोगों में भ्रान्तियों का प्रचार होने लगा है। वेदों से कुछ लोग पशुवध करने लगे तो कुछ लोग वेदों से बहुदेववाद और अंधविश्वासयुक्त कर्मकांड़ों का प्रचार प्रसार करने लगे। यह सब वेदों के अशुद्ध भाष्य और प्राचीन वेदार्थ परम्परा के लोप से होने लगा। वेदों पर महीधर, उवट आदि ने यास्क के नियमों और उचित उहा की अवेहलना करके अपने मन्तव्य की आधार शिला पर ऐसा भाष्य किया कि वेदों को लोग जादू-टोना और अश्लीलता के ग्रन्थ मानने लगे थे। पाश्चात्य लोगों ने भी वेदों को कलंकित करने में कोई अवकाश नहीं छोडा तथा वेदों को गडरियों के गीत के रूप में प्रचारित किया गया। जनमानस भी वेदों से दूर होकर गीता, रामचरितमानस और पुराणों तक सीमित हो गया। ऐसे में वेदों के उचित अर्थ और शुद्ध वास्तविक मन्तव्य को स्वामी दयानन्द जी ने प्रकाशित किया। इन्होनें सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका और संस्कारविधि नामक त्रि ग्रन्थ रूप रत्नों की रचना की जिससे समाज को वेदों की शिक्षा को समझने की एक नई दिशा मिली। इन तीनों ग्रन्थों में स्वामी जी का ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका अति महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में स्वामी दयानन्द जी ने वेदों के सम्बन्ध में प्रचलित अनेकों भ्रान्तियों का निराकरण किया है। वेदों में वर्णित उपासना विधि और आर्ष ग्रन्थों का विवरण विस्तार पूर्वक इस ग्रन्थ में स्वामी जी ने किया। महर्षि दयानन्द जी नें इस ग्रन्थ में वेदों में विज्ञान और तकनीक को दिखा कर सिद्ध किया कि वेद प्रत्येक युग और प्रत्येक वर्ग के लिए सदा ही प्रासंगिक है। उन्होने इस धारणा को अच्छे से स्थापित किया कि वेद ही ईश्वरीय ज्ञान है।
इस ग्रन्थ में निम्न विषय है –
(क) अध्याय 1 – इसमें ईश्वर की प्रार्थना विषय का वर्णन है।
(ख) अध्याय 2 – इसमें वेदोत्पत्ति के विषय में प्रकाश डाला है।
(ग) अध्याय 3 – इस अध्याय में सिद्ध किया है कि वेद नित्य है।
(घ) अध्याय 4 – इस अध्याय में वेदविषयों पर विचार प्रकट किया है। वेदों से एकेश्वरवाद को प्रस्तुत किया है। विज्ञानकाण्ड और कर्मकाण्ड विषय को समझाया है। देवता शब्द की मीमांसा और देव संख्या का निर्णय किया है। मोक्षमूलर के मत का खण्डन किया गया है।
(ङ) अध्याय 5 – इस अध्याय में वेद संज्ञा पर विचार किया है।
(च) अध्याय 6 – इस में वेदों में वर्णित ब्रह्म विद्या का उल्लेख किया है।
(छ) अध्याय 7 – इस अध्याय में वेदोक्त धर्म का विवेचन किया है।
(ज) अध्याय 8 – इसमें सृष्टि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय पर प्रकाश डाला है। इस अध्याय में पुरूष सूक्त की व्याख्या की गई है।
(झ) अध्याय 9 – इस अध्याय में पृथिव्यादिलोकभ्रमण विषय पर प्रकाश डाला है।
(ञ) अध्याय 10 – इस अध्याय में ग्रहादि के मध्य आकर्षण-अनुकर्षण को वेद प्रमाणों से प्रस्तुत किया है।
(ट) अध्याय 11 – इस अध्याय में प्रकाशक और अप्रकाशक लोकों का वर्णन किया है।
(ठ) अध्याय 12 – इस अध्याय द्वारा बताया है कि वेदों में गणित विद्या का मूल है।
(ड) अध्याय 13 – इस अध्याय में ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और समर्पण विषय का वर्णन है।
(ढ) अध्याय 14 – इस अध्याय में उपासना विधि पर प्रकाश डाला है।
(ण) अध्याय 15 – इस अध्याय में मुक्ति और मुक्ति से पुनरावर्ति का विवेचन किया है।
(त) अध्याय 16 – इस अध्याय में वेदों से नौकायन, विमान विद्या का मूल दर्शाया है।
(थ) अध्याय 17 – इस अध्याय में तार और संचार विद्या का मूल वेदों से दर्शाया है।
(द) अध्याय 18 – इस अध्याय में वेदों से आयुर्वेदादि चिकित्सा विज्ञान का मूल दर्शाया है।
(ध) अध्याय 19 – इस अध्याय में पुनर्जन्म का वेदों और दर्शनों के प्रमाण से स्पष्टीकरण किया गया है।
(न) अध्याय 20 – इस अध्याय में विवाह विषय को लिखा गया है।
(ऩ) अध्याय 21 – इस अध्याय में नियोगादि विषय को लिखा है।
(प) अध्याय 22 – इस अध्याय में राजा और प्रजा के कर्तव्यों का उल्लेख किया है।
(फ) अध्याय 23 – इस अध्याय में वर्णाश्रम धर्म का वर्णन है।
(ब) अध्याय 24 – इस अध्याय में पाँच महायज्ञों जैसे – अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, बलिवैश्वदेवयज्ञ और अतिथियज्ञ का वर्णन है।
(भ) अध्याय 25 – इस अध्याय में आर्ष अनार्ष ग्रन्थों का वर्णन, वैदिक आख्यानों का शुद्धार्थ पर प्रकाश डाला है।
(म) अध्याय 26 – इस अध्याय में वेदों के अधिकारी एवं अनाधिकारी का उल्लेख किया है।
(य) अध्याय 27 – इसमें पठन-पाठन विधि का वर्णन है।
(र) अध्याय 28 – इस अध्याय में वेदों के भाष्य करने की विधि, शङ्काओं का समाधान आदि का निरूपण है तथा सायण और महीधर के भाष्यों का खण्डन किया है।
(ऱ) अध्याय 29 – इस अध्याय में वेदभाष्य करने की शैली और विषयों के सम्बन्ध में की हुई प्रतिज्ञा का वर्णन है।
(ल) अध्याय 30 – इस अध्याय में वेदार्थ सम्बन्धित विविध प्रश्नोत्तर का निरूपण है।
(ळ) अध्याय 31 – इस अध्याय में वैदिक-प्रयोग का नियम प्रस्तुत किया है।
(ऴ) अध्याय 32 – इस अध्याय में वेदों में प्रयुक्त उदात्त, अनुदात्त और स्वरित तथा षडाजादि सप्त स्वरों का निरूपण किया है।
(व) अध्याय 33 – इस अध्याय में व्याकरण नियमों का वर्णन है।
(श) अध्याय 34 – इस अध्याय में वेदों में प्रयुक्त रूपकादि अलङ्कारों का वर्णन किया है।
(ष) अध्याय 35 – इस अध्याय में वेद भाष्यों में प्रयुक्त ग्रन्थों के संकेतों का स्पष्टीकरण किया है।
ऋषि दयानन्द जी ने वेदों की इस अद्भूत और अनन्त रत्नगर्भा निधि को उस पर पड़ी हुई धूलि को झाड़-पौछ्कर विशुद्ध रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत किया।
स्वामी दयानन्द के इस महान ग्रन्थ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से अनेकों लोग प्रभावित हुए है। कई लोगों ने अपनी धारणाओं को इस ग्रन्थ के प्रभाव में बदला है। इनमें से कुछ विद्वान निम्न है –
1) दाक्षिणात्य विद्वान सुप्रसिद्ध श्री माधव पुण्डलीक पण्डित ने ‘Mystic Approach to the veda and upanisd’ में वेदों के सम्बन्ध में ऋषि दयानन्द के दृष्टिकोण तथा उनके वेदभाष्य के महत्त्व की चर्चा करते हुए लिखा है –
“By the middle of the last century the call to re establish the vedas on the sovereign pedestal for predesiding over an assured and inevitable resurgence of the national life, found a vigorous expression in the stalwart champion of ancient culture, Swami Dayanand Sarswati. He called for a bold dispersal of the fog of half – baked theories of alien prejudice that had settled round the luminous Vedas and enjoined upon every son of the soil to look straight into the force of the truth and recognize there what was indeed a Revealed Scripture. He pointed out with unanswerable proof how the concept of one Deity stood out toweringly in the Hymns with all other gods as names for its qualities and powers – page 17

अर्थात् – गत शताब्दी के मध्य में वेदों को पुनः भारत के राष्ट्रीय जीवन के सर्वोत्कृष्ट रूप से प्रतिष्ठापित करने के लिए भारतीय संस्कृति के प्रबल पोषक स्वामी दयानन्द सरस्वती के रूप में प्राप्त हुए। उन्होनें ज्योतिर्मय वेदों के सम्बन्ध में भ्रान्तियों और पक्षपातपूर्ण पाश्चात्य विचारधारा का प्रात्याख्यान करके प्रत्येक भारतीय को प्रेरणा की कि वह सत्य को सीधा देखने का प्रयत्न करे और इस बात को पहचाने कि वेद वस्तुतः ईश्वरीय ज्ञान है। उसने अकाट्य प्रमाणों से इस बात को सिद्ध किया कि वेदों में एक ईश्वर का विचार अत्यन्त स्पष्ट रूप में प्रतिपादित किया गया है। अन्य देव तो उसके गुणों तथा शक्ति के सूचक मात्र है।

2) वैदिक विचारधारा को भ्रष्ट करने के उद्देश्य से भारत आये, मैक्समूलर भी स्वामी दयानन्द के इस महान कृति से प्रभावित हुए बिना न रहा और अपने अन्तिम ग्रन्थ “The Six System of philosophy” में इस बात को स्वीकार किया कि वेदों में इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि आदि सभी एक परमेश्वर के नाम है। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए Biographical Essays में स्वामी दयानन्द पर लिखे निबन्ध में लिखा है –
“To Swami Dayanand everything contained in the Vedas was not only perfect truth, but he went up one step further and by their interpretation, succeeded in persuading others that every Vedas. Steam engines, electricity, telegraphy and wireless microgram were alluded to in the Vedas. Steam engines, electricity, telegraphy and wireless microgram were shown to have been known at least in the poets of the Vedas.”
अर्थात् स्वामी दयानन्द की दृष्टि में वेदों में पूर्ण सत्य का ही प्रतिपादन किया है। इतना ही नहीं, वे एक कदम और आगे बढ़े और उनकी व्याख्या द्वारा उन्होनें औरों को विश्वास दिलाने में सफलता प्राप्त की कि जो कुछ भी ज्ञातव्य है, जिसमें भाप के इंजन, बिजली, तार, बेतार आदि भी सम्मिलित हैं, वर्त्तमान विज्ञान के इन सब नवीनतम आविष्कारों का भी वैदिक ऋषियों को ज्ञान था।

2) स्वामी दयानन्द के वेदों में विज्ञान विषयक मन्तव्य का विवेचन करते हुए श्री अरविन्द ने अपने निबन्ध Dayanand and the veda में लिखा है –
“There is noting fantastic in Dayanad s idea that the veda contains truths of science as well as truth of religion. I will even add my own convinction that Veda contains the other truths of science which the modern world does not at all posses, and in that case dayanand has rather understated than overstated the depth and range of Vedic wisdom.
दयानन्द की इस अवधारणा में कि वेद में धर्म और विज्ञान दोनों की सच्चाई पाई जाती है, कोई उपहासास्पद या कल्पनामूलक बात नहीं है। मैं इसके साथ अपनी भी धारणा जोड़ देना चाहता हूँ कि वेदों में विज्ञान की वे सच्चाइयाँ भी हैं जिन्हें आधुनिक विज्ञान अभी तक नहीं जान पाया है। ऐसी अवस्था में स्वामी दयानन्द ने वैदिक ज्ञान की गहराई के सम्बन्ध में अतिशयोक्ति से नहीं, अपितु न्यूनोक्ति से ही काम लिया है।

इस प्रकार महर्षि दयानन्द के इस महान ग्रन्थ का प्रभाव अनेकों विद्वानों ने स्वीकार किया।
अतः इस वर्णन से यह सिद्ध है कि वेदों में वास्तव में क्या है और वेदों के सम्बन्ध में जो भी भ्रान्तियां प्रचलित है उनका समाधान कैसे हो तो इसका एक ही उत्तर है और वह है – ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका।

इस ग्रन्थ के अनेकों संस्करण प्रचलित है किन्तु प्रस्तुत संस्करण की निम्न विशेषताऐं हैं –
1) महर्षि दयानन्द की ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका को हृदयङ्गम करने में एक समस्या यह है कि महर्षि ने एक – एक प्रकरण में अनेक प्रश्न उठाये हैं और उनका समाधान भी प्रस्तुत किया है, परन्तु विषयसूची या स्थूलदृष्ट्या देखने पर उन सब को समझ पाना सम्भव नहीं हो पाता है। प्रस्तुत संस्करण में 27 पृष्ठ की विषयसूची सम्मिलित है, विषयसूची में जिन शीर्षकों के समक्ष चिह्न बने हुए हैं, वे सभी सम्पादक के बनाये हुए हैं और जिन शीर्षकों पर कोई भी चिह्न नहीं है, वे सभी महर्षिकृत है। इस प्रकार बहुत समय से चली आ रही आवश्यकता को प्रस्तुत संस्करण के माध्यम से पूरा किया गया है।
2) महर्षि दयानन्द ने ऋग्वेद के उद्धरणों के पते अष्टक में दिये हैं, आज का विद्वत्समाज अध्ययन में अष्टक क्रम का प्रयोग नहीं करता है, अतः अष्टक के आधार पर मन्त्र के मूल तक पहुँचना कठिन हो जाता है। इसलिये ऋग्वेद के पते मण्डलक्रम में दिये जाने उचित प्रतीत होते हैं। प्रस्तुत संस्करण में उन पतों को मण्डल क्रम में दिया गया है।
3) महर्षि दयानन्द ने भाष्यभूमिका में अनेक विषय प्रतिपादित किये हैं, प्रकरण के आधार पर उन विषयों तक पहुँच पाना अध्येता के प्रायः सरल नहीं होता। प्रस्तुत संस्करण में सम्पादक ने परिशिष्ट के रूप में अकारादि क्रम से विषयों को प्रस्तुत किया है, इस पर दृष्टिपात करने से इस संस्करण की उपयोगिता प्रमाणित हो जाती है।
4) महर्षि दयानन्द ने किसी विषय को प्रतिपादित करते हुए अनेकशः पाँच, सात और दस मन्त्रों तक एक साथ उपस्थापित कर दिये हैं और तत्पश्चात् उनके संस्कृत में अर्थ दियें हैं और अन्त में उन मन्त्रों के हिन्दी में अर्थ दिये हैं। एक सामान्य पाठक से लेकर गम्भीर अध्येता तक के लिये उन सभी मन्त्रों के अर्थ को हृदयङ्गम कर पाना कठिन हो जाता है। इसलिये प्रस्तुत संस्करण में महर्षि के एक मन्त्र, उस मन्त्र का संस्कृत अर्थ और तत्पश्चात् उनका हिन्दी अर्थ दिया जाता है। ऐसा करते ही विषय को बोधगम्यता का स्तर अधिक हो जाता है।
5) प्रत्येक मन्त्र के साथ संस्कृत और हिन्दी का अर्थ देते समय सम्पादकीय मर्यादा का पालन करते हुए यह ध्यान रक्खा गया है कि महर्षि का कथन यथावत् उद्धृत किया जाए, उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन या परिवर्धन न हो। जहाँ यह लगा है कि संस्कृत में कहा गया आशय हिन्दी में नहीं आ पाया है, उसको सम्पादक ने कोष्ठक में डाल कर दिया है। सम्पादन की सीमा रेखा को ध्यान में रखते हुए पूर्ण सजगता के साथ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के गौरव को बढ़ाने का प्रयास किया गया है।

आशा करते है कि पाठकगण इस संस्करण का स्वागत करेगा तथा इस महान कृति के अध्ययन से वेदों के अध्ययन और वेदों में निहित मर्यादाओं के पालन की ओर अग्रसर होगा तथा समाज के कल्याण की भावना से अपने प्रत्येक कार्यों को करेगा।