निर्णय के तट पर

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पुस्तकों का नाम – निर्णय के तट पर
संग्रहकर्त्ताओं का नाम – लाजपतराय अग्रवाल
मनुष्य की परिभाषा करते हुये महर्षि यास्क ने लिखा है कि जो सोच समझकर कर्म करें अर्थात् जो विचारशील हो उसका नाम मनुष्य है। मनुष्य को प्रत्येक बात को विचारपूर्वक और परीक्षण पूर्वक ही मानना चाहिये। विचार चाहें धार्मिक हों या सामाजिक प्रत्येक जगह सत्यासत्य के निर्णय के लिये वाद – विवाद, मार्गदर्शनादि आवश्यक कार्य होते हैं। धार्मिक क्षेत्र में भी सत्यासत्य के निर्णय के लिये प्राचीन काल से ही वादविवाद होते आये हैं जिन्हें शास्त्रार्थ कहते हैं। प्राचीनकालीन ऋषियों से लेकर मध्यकालीन शंकराचार्य, कुमारिलभट्टाचार्य, जयन्तभट्ट तथा आधुनिक कालीन महर्षि दयानन्द आदि श्रेष्ठ शास्त्रार्थ महारथी रहें हैं जिनके शास्त्रार्थ आजतक लोग अध्ययन करते हैं तथा लाभान्वित होते हैं।

सत्य के निर्णय के लिये तथा वैदिक धर्म के मंड़न के लिये महर्षि दयानन्द जी ने अनेकों शास्त्रार्थ किये। उन्होनें अपने शास्त्रार्थों में अपनी शास्त्रयोग्यता और युक्तियों से विरोधियों के मन्तव्यों को ध्वस्त कर दिया तथा वैदिक धर्म का प्रचार प्रसार किया। स्वामी जी के पश्चात् आर्यसमाज में अनेकों विद्वान हुये जिन्होनें अपने शास्त्रार्थों के द्वारा जनता के सम्मुख वैदिक धर्म की अमिट छाप छोड़ी तथा महर्षि दयानन्द जी के कार्यों को आगे बढ़ाया। इनमें प्रमुख – ठॉ. अमरसिहं जी, स्वामी दर्शनानन्द जी, पं. लेखराम जी, बुद्धदेव मीरपूरी जी, गंगाप्रसाद उपाध्याय जी, रामचन्द्र देहलवी जी, पं. तुलसी स्वामी, पं. गणपति शर्मा जी इत्यादि विद्वान है।
इन सबके शास्त्रार्थ जहां पाठकों में उत्साह भरते हैं वहीं सैद्धान्तिक युक्तियों का संग्रहण भी इन शास्त्रों में हुये वाद –विवाद से हो जाता है तथा इनके द्वारा भावी शास्त्रार्थ महारथियों को शास्त्रार्थ विद्या की कुछ शैलियाँ भी प्राप्त होती है। अनेकों सैद्धान्तिक लाभ इन शास्त्रार्थों के द्वारा होते हैं।
सभी विद्वानों के सभी शास्त्रार्थ एक स्थान पर प्राप्त नहीं होते हैं अतः इनका अध्ययन एक दुष्कर कार्य है। कई शास्त्रार्थों की आज कोई भी पत्रिका या समाचार पत्र उपलब्ध नहीं है जिससे उनके विषय में जानना असम्भव है किन्तु प्रस्तुत पुस्तकों में ऐसे ही आर्य समाज के प्रसिद्ध विद्वानों के विभिन्न मत के विद्वानों से हुए शास्त्रार्थों का संग्रह है। ये संग्रह पाँच भागों में हैं। जिनमें निम्न विद्वानों के शास्त्रार्थों का संग्रह है –
1) प्रथम भाग में आर्य विद्वान अमर सिंह जी, दर्शनानन्द जी, पंडित रामदयालु शर्मा जी, पंडित भगवान स्वरूप जी के अद्वैत मत के गीता राम शास्त्री जी, गणेश दत्त शास्त्री जी, प्रेमाचार्य जी तथा मुस्लिम मत के मौलाना सनाउल्लाह साहिब जी, आरिफ खान जी, इदरीस अहमद खाँ आदि तथा ईसाइयों के पादरी अब्दुल हक तथा जैनियों के श्री वर्धमान शास्त्री जी से शास्त्रार्थों का संग्रह है।

2) द्वितीय भाग में आर्य विद्वान पण्डित देवदत्त शर्मा, लक्ष्मीदत्त आर्यमुसाफिर, शुक्रराज शास्त्री, सत्यमित्र शास्त्री, मनसाराम वैदिक तोप, पंडित रामचन्द्र जी देहलवी, पंडित गणपति शर्मा जी तथा अद्वैत मत के पंडित कमलनयन शर्मा जी, हेमराज जी, शङ्कराचार्य निरंजन देव तीर्थ, कालूराम शास्त्री तथा इस्लाम के मौलवी अब्दूल फरह साहिब, गाजीमहमूद तथा ईसाईयों के पादरी विलकटन्, पादरी जानसान तथा जैनियों के छेदालाल जी, पन्नालाल जी, गोपालदास जी आदि के शास्त्रार्थों का संग्रह है।

3) तृतीय भाग में आर्य विद्वान आत्माराम अमृतसरी जी, ठाकुर प्रसाद शास्त्री, लोकनाथ जी तर्कवाचस्पति जी, शिवशंकर शर्मा जी, गोपाल जी पत्रकार, चन्द्रमणि जी तथा अद्वैत मत के श्री राम शास्त्री जी, यमुनादास जी, ज्वालाप्रसाद जी, शंकर हरिहर तीर्थ, जयदेव जी मीमांसाचार्य, भट्ट जटाशङ्कर जी शास्त्री तथा मुसलमानों की ओर से इब्राहिम साहिब तथा ईसाईयों की ओर से पादरी इलियास आदि विद्वानों के शास्त्रार्थ हैं।

4) चतुर्थ भाग में आर्य विद्वान राजाराम जी शास्त्री, विश्वबंधु जी शास्त्री, भगवद्दत्त जी रिसर्च स्कॉलर, स्वामी ब्रह्ममुनि जी, रामलाल जी, ओमप्रकाश जी शास्त्री तथा अद्वैत मत से चन्द्रशेखर भट्ट जी, छोटु जी महाराज, बाल शास्त्री जी तथा ईसाईयों की ओर से पादरी अब्दुल हक के शास्त्रार्थों का संग्रह है।

5) पंचम भाग में आर्यविद्वान मुन्शीराम जी, हंसराज जी, श्री राम आर्य, जे. पी. चौधरी, पं. वेद भूषण जी, मुन्शी इंद्रमणि जी तथा अद्वैत वादियों में आचार्य भवानी शङ्कर जी, गोपीनाथ कश्मीरी, सीताराम दास शास्त्री, पं. माध्वाचार्य, राव साहब बहादूर तथा ईसाईयों के स्काट साहब, नोबिल साहब, बिहारी लाल ईसाई तथा मुसलमानों की ओर से मोहम्मद कासिम साहब, अहमद हुसैन, इमाम अबू, अब्दूल मूहम्मद हसन आदि तथा जैनियों के साधु सिद्धकरण के शास्त्रार्थों का संग्रह है।

ये सभी शास्त्रार्थ एक ही स्थान पर इन पुस्तकों द्वारा एकत्रित कर दिये गये हैं। ये शास्त्रार्थ पाठकों की अनेकों शङ्काओं का भी समाधान करेंगे। ये पुस्तकें स्वाध्यायशील पाठकों तथा भावी शास्त्रार्थ महारथियों के लिए अत्यन्त प्रेरणास्पद रहेगा।

 

●क्या परमेश्वर निराकार है ?●

●शास्त्रार्थ●

स्थान – “कचौरा” जिला अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)

दिनांक – सन् १९२३ ई.

विषय – क्या परमेश्वर निराकार है ?

आर्यसमाज की ओर से शास्त्रार्थकर्ता – श्री पण्डित बिहारीलाल जी शास्त्री “काव्यातीर्थ”

पौराणिक पक्ष की ओर से शास्त्रार्थकर्ता – व्याकरणाचार्य पण्डित चन्द्रशेखर जी

(शंकराचार्य निरञ्जनदेव जी तीर्थ )

सहायक – श्री करपात्री जी महाराज

श्री पण्डित चन्द्रशेखर जी व्याकरणाचार्य
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भाईयों ! सुनों !!! आर्याभिविनय पुस्तक स्वामी दयानन्द की बनाई हुई है जिसमें दयानन्द ने लिखा है कि – “मेरे सोम रसों को है ईश्वर सर्वात्मा से पान करों” क्या निराकार सोमरस पान करता है ? यह ईश्वर को भोग लगाना नही है तो और क्या है ? हम श्री ठाकुर जी को भोग लगाते है तो यह आर्यसमाज आक्षेप करते है, और आप निराकार को सोमरस पिला रहे हो तो कुछ नही ? “निराकार सोमरस कैसे पी रहा है ? हमारे भगवान तो साकार है तो हमारा भोग लगाना तो उचित ही हुआ न ? परन्तु तुम आर्यों का कमाल है, कि एक तरफ उसे निराकार मानों, दूसरी तरफ उसे सोमरस पिलाओ | ये कैसे सम्भव हो सकता है ?

श्री पण्डित बिहारीलाल जी शास्त्री –

महाराज ! वास्तव में निराकार ही खाता पीता है, साकार नही ! ! देखियें कैसे ? मै समझाता हूँ | जब जिस समय इस शरीर से जीवात्मा निकल जाता है, तब यह साकार शरीर कुछ भी नही खाता पीता है, अगर किसी ने मुर्दे को खाता पीता हुआ देखा हो तो बताओं ? (जनता में हसी …) निराकार ईश्वर सर्वत्र व्यापक है | वह सोमरस में भी व्यापक है | इसी कारण यहा सर्वात्मा शब्द का प्रयोग हुआ है
| सर्वव्यापक ईश्वर को हमारे अर्पित सोमरस का ज्ञान है |

सर्वज्ञत्व से वह पान करता है, यह ज्ञानरूपी पान अलंकारित वाक्य है, देखिये वेदान्त दर्शन मे ईश्वर को अत्ता अर्थात खाने वाला कहा है | देखिये – “ अत्ताचराचर ग्रहणात्” | क्योंकि वह ईश्वर सर्वव्यापक होने से सबका खाने वाला है | आपके ही मान्य ग्रन्थ वेदान्त दर्शन का ही यह वचन मैंने बोला है |

श्री पण्डित चन्द्रशेखर जी व्याकरणाचार्य –

ईश्वर साकार ही भोग ग्रहण करता है | निराकार को भोजन की आवश्यकता नही | सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है – “सोमसद: पितरस्तृप्यन्ताम्” यह चन्द्रलोक में रहने वाले पितरो का तर्पण नही तो और क्या है ? आर्य समाजियों के गुरु ग्रन्थ में पितरों के तर्पण मानते है, परन्तु आर्य समाजी पितृ श्राद्ध का खंडन करते है, यह अपने ग्रंथो का तथा अपने गुरु का विरोध है |

श्री पण्डित बिहारीलाल जी शास्त्री –

पण्डित जी ! निराकार भगवान सर्वव्यापक है ! साकार सर्वव्यापक नही है, साकार सर्वव्यापक हो ही नही सकता है | जिसे खाने पीने की आवश्यकता हो तो वह भगवान हो ही नही सकता | भगवान सब आवश्यकताओ ओर इच्छाओ से मुक्त होता है | पूर्ण काम है | वह अपनी सर्वज्ञता से हमारे द्वारा किये गये सोमरस, शुद्ध प्रेम भावो को जानते है, स्वीकार करता है |

यहां सोमरस कोई भौतिक पदार्थ नही, किन्तु इस मन्त्र में उस सोमरस का संकेत है जिसे वेद ने कहा है – “सोमं यं ब्राह्मणा विदुर्नतस्यापुनाति कश्चन” अर्थात् वह सोमरस जिसे विद्वान् ब्राह्मण जानते है | उसको कोई नही खाता है, अर्थात वह है, शुद्ध ब्रह्मज्ञान, आध्यात्मिकता, भगवान का प्रेम उसका रस तो योगी ही ले सकता है |
उसी प्रेम भाव को भक्त अपने ईष्ट देव को अर्पित कर रहा है | और सोम, सदपितरो के तर्पण से पहले यह जानना चाहिए कि पितर है क्या ? देखिये श्री उव्वट और आचार्य महीधर जी के यजुर्वेद भाष्य में लिखा है – “ ऋतवों वै पितर:” ये छै ऋतुये पितर है | इन्ही को वेदों में कहा है – “नमो व: पितर: शोषाय नमो व: पितरो रसाय “ आदि |

ये ऋतुए चन्द्रमा से सम्बन्ध है | अत: सोमसद कही गई है | ऋतु – ऋतु पर यज्ञ करके इन पितरो को तृप्त करो तो कोई रोग नही फैलेंगा, प्रकृति में विकार नही होगा | यदि सब मरने वाले चन्द्रलोक में जाकर पितर बन जाते है, तो पुनर्जन्म किसका होता है ? और चन्द्रलोक में जन्म लेने वालो की तृप्ति हम क्यों करे ? प्रजापति भगवान सबका प्रबन्ध तत् कर्मानुसार ही करते है | पण्डित जी महाराज ! आपको पता होना चाहिए कि कर्मो का फल संस्कार द्वारा ही मिलता है | संस्कार सूक्ष्म शरीर पर स्वकृत कर्म से पड़ते है |

परकृत कर्म के द्वारा नही | मृतक श्राद्ध मान लेने से स्वकृत कर्मफल हानि और परकृत कर्म फलाप्ति से दो दोष आते है, और कर्म सिद्धांत को दूषित कर देते है , क्या “तमाशा” है कि अपनों की तो सुध बुध है, नही, दौड़ते है चन्द्रलोक तक थाल लिये पितरों को ! देश के सहस्त्रो बालक भूख से बेचैन होकर इसाई बनते है | आप चन्द्रलोक की प्रजा का पालन करने चले है |
नोट –
इन बातों पर जनता में जबरदस्त अट्टहास हुआ जिससे पौराणिक पण्डित शास्त्रार्थ के बीच में ही बिगड़ खड़े हुए, कि हमारी बातो को तमाशा कह दिया, उनसे बहुतेरा अनुनय विनय किया गया कि “तमाशा” शब्द, अपशब्द वा गाली नही है | ये उर्दू का शब्द है |

जो क्रीडा व खेल के अर्थो में आता है पर वे न माने, क्योंकि वे तो पीछा छुडाने का कोई न कोई बहाना ढूँढ रहे थे, वह बहाना उनकों मिल ही गया, और वह क्रोध भरे अपने पुस्तक भी मेज पर ही छोडकर चल दिये |
इस शास्त्रार्थ के बाद वे कभी फिर यहा नही पधारे, और आर्य समाज की चहुंमुखी उन्नति हो उठी, बाद में यहाँ पर आर्यसमाज मन्दिर बना पाठशाला खुली, बड़े – बड़े विशाल उत्सव होते रहे | ये केवल उसी शास्त्रार्थ का प्रभाव था |

● साभार – प्राचीन शास्त्रार्थ संग्रह “निर्णय के तट पर भाग-२ के सौजन्य से ….

● नोट :- यह शास्त्रार्थ निर्णय के तट पर भाग-२ से लिया गया है और पुस्तक के प्रकाशक के अनुमति से यहाँ सबके लाभार्थ प्रस्तुत किया जाता है | यदि आपको सभी शास्त्रार्थ ( निर्णय के तट पर १-५ भाग ) आवश्यक हो आप संपर्क कर सकते है |
क्रमशः …………………………………………