मनुस्मृति

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पुस्तक का नाम – मनुस्मृति
भाष्यकार – पन्डित तुलसी राम स्वामी
 
वेद के पश्चात सबसे प्राचीन आर्ष ग्रन्थों में मनुस्मृति का स्थान है। यह समस्त भूमंडल का प्रथम सविधान है। इसमें वर्णव्यवस्था, वर्णों के कर्तव्य, आश्रम के नियमों, धर्म और राजनीति आदि विषयों का संकलन है। लेकिन दुर्भाग्य से काल कराल के वश में होने से इसमें अनेकों स्वार्थी लोगों द्वारा प्रमादवश अनेकों श्लोकों का प्रक्षेपण हुआ। इन्ही प्रक्षिप्त श्लोकों के चलते एक वर्ग विशेष मनु और मनुस्मृति की निंदा करता है। इसलिए इसके शोधयुक्त, प्रक्षिप्त अंश वर्जित भाष्य की आवश्यकता रहती है जो तुलसी राम स्वामी जी ने इस भाष्य द्वारा पूरी की है। १८-१९ सदी में प्रसिद्ध वेद-वेदांग ज्ञाता ऋषि दयानंद जी ने मनु स्मृति के क्षेपकों की ओर इशारा किया था। उन्होंने अपने ग्रन्थों में अन्य स्मृतियों की तुलना में सबसे अधिक मनुस्मृति को प्रमाणिक और आर्ष माना है, तथा सत्यार्थ प्रकाश में अनेकों स्थान पर मनुस्मृति के प्रमाण दिए है। स्वामी दयानन्द जी का अनुसरण करते हुए तुलसीराम स्वामी जी ने मनुस्मृति को विकृति से सुकृति में लाने के प्रयास में प्राचीन छह भाष्यकारों मेधातिथि, नारायण, कुल्लुक आदि और ३० से ऊपर पुस्तकों के संग्रह और अध्ययन कर दूध पानी का भेद कराया। उन्होंने श्लोकों के प्रक्षिप्त होने का यथासम्भव कारण, पाठान्तर पाठाधिक्य, पाठभेदों का विभिन्न टिप्पणियों के माध्यम से उल्लेख कर नीर-क्षीर विवेक के द्वारा कठिन कार्य को पूर्ण किया है। इस पुस्तक के अध्ययन से मनु जी और मनुस्मृति पर आक्षेप करने वालों, मनु को गलत कहने वालो की शंकाओं, पूर्वधारणाओं का उन्मूलन होगा। इस पुस्तक में प्रक्षिप्त श्लोकों को अलग न कर टिप्पणी सहित रखा गया है ताकि पाठकगण स्वयं तुलनात्मक अध्ययन से सत्य को जाँच सके।
 
मान्यवर तुलसी स्वामी जी ने पुस्तक रचना में भिन्न-भिन्न विद्वानों के उद्धरणों को भी स्पष्ट किया है।
आशा है सज्जन-वृन्द इससे प्रसन्न हो कर लाभान्वित अवश्य होंगे।