जिज्ञासु रचना मन्जरी (2 खन्डों में)

NameJigyasurachna Manjari ( Vol 1-2 )
AuthorPt. brahmdutt jigyasu 
LanguageHindi
Edition1st
Binding Hard Cover
ISBN/SKUbook00163

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Jigyasurachna Manjari ( Vol 1-2 )

 

पुस्तक का नाम – जिज्ञासु रचना मञ्जरी

लेखक का नाम – पंडित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी
पदवाक्यप्रमाणज्ञ पं. श्री ब्रह्मदत्त जिज्ञासु द्वारा विरचित यह ग्रंथरत्न वेद और वेदार्थ के जिज्ञासुओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है । इसमें वेद , वेदार्थ और उसकी प्रक्रियायें व सिद्धांत, वेदार्थ की समस्याएँ और उनका समाधान आदि अनकों विषय अनुसंधान पूर्वक एवं प्रमाणिकता के साथ निरूपित हैं

 

आचार्य ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी आर्य समाज के अष्टाध्यायी और निरूक्त के उत्कृष्ट विद्वानों में से एक थे। इनके द्वारा अष्टाध्यायी के प्रचार-प्रसार में विशेष योगदान निहित है। पूज्य ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी ने रामलाल कपूर ट्रस्ट से अनेकों ग्रन्थों का लेखन और प्रकाशन किया। उनके द्वारा लिखे गए कई लेखों और पुस्तकों को पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी ने सङ्ग्रहित कर जिज्ञासु-रचना-मञ्जरी नाम से दो भागों में सम्पादित करवाया।

 

इसके प्रथम भाग के विषयों का विवरण निम्न प्रकार है –

इस भाग में ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु जी का स्वलिखित जीवन-परिचय सम्मलित किया गया है।

इसके पश्चात् वेद-वेदार्थ-विवेचन जिसमें जिज्ञासु जी द्वारा किये गये स्वामी दयानन्द के यजुर्वेद भाष्य विवरण की भूमिका को उद्धृत किया है। इस भाष्य-विवरण के विषयों का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है-

यजुर्वेदभाष्य-विवरण की भूमिका – इसमें वेदज्ञान के दार्शनिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए, बताया है कि वेद ज्ञान ईश्वरीय है तथा आदिभाषा ईश्वरीय ही होती है। वेदों का ज्ञान ईश्वर के द्वारा ऋषियों को कैसे प्राप्त हुआ, इसका दार्शनिक विवेचन किया गया है।

वेदार्थ में ब्राह्मण ग्रन्थों से लेकर श्रौतसूत्रों तक के योगदान का उल्लेख किया है। वेद और शाखाओं का परिचय करवाते हुए शाखा और वेदों में अन्तर को स्पष्ट किया है तथा महर्षि दयानन्द-स्वीकृत शाखा के स्वरूप पर उठाई गई शङ्का का समाधान किया है।

वेदार्थ की कसौटियाँ को दर्शाते हुए सायण और महीधर आदि भाष्यकारों की भूलों को चिह्नित किया है। वेदों के शब्द यौगिक है, इस सम्बन्ध में अनेकों प्रमाणों को प्रस्तुत पुस्तक में प्रस्तुत किया है। वेदार्थ में आवश्यक छन्दों को उद्धृत किया है तथा महर्षि द्वारा निर्धारित छन्दों पर लगाये गये आश्रेपों का उत्तर इस पुस्तक में दिया है। यजुर्वेद भाष्य विवरण की विशेषताओं के वर्णन के साथ इस अध्याय को समाप्त किया है।

 

इस पुस्तक का द्वितीय अध्याय वेद और निरुक्त है, इसके विषयों का विवरण निम्न प्रकार है –

वेद और निरुक्त – इस अध्याय में वेद और निरुक्त के सम्बन्ध का वर्णन किया है जिसमें वेदार्थ में निरुक्त के योगदान पर प्रकाश डाला है। ऋषि मन्त्र कर्ता अथवा दृष्टा इसका स्पष्टीकरण किया है। निरुक्त में ऋग्वेद के मंत्रों का प्रयोग होने से निरुक्त केवल ऋग्वेद का व्याख्यान नहीं, वो सभी वेदों के अर्थ पर कार्य करता है इसका सविस्तार वर्णन किया है। यास्क द्वारा प्रदर्शित ऋषि और देवता के विनियोगों का वर्णन किया है। सर्वानुक्रमणिकाओं और बृहद्देवता में देवता विषय पर विरोधाभास दर्शाते हुए, इस विरोध के कारण पर विचार प्रस्तुत किया है। यास्क और पदपाठ तथा यास्क और यौगिकवाद के सम्बन्धों का उल्लेख किया है।

 

इस पुस्तक का तृतीय अध्याय निरुक्तकार और वेद में इतिहास है, इसका संक्षिप्त विषय विवरण निम्न प्रकार है –

इसमें निरुक्तकार के द्वारा दिये गये आख्यान वास्तव में मानवीय इतिहास न होकर ऋषियों के प्रीति भाव के कारण मन्त्रार्थ को स्पष्ट करने के लिए कहे गए काल्पनिक आख्यान मात्र है, इस कथन की पुष्टि के लिए निरुक्त के प्रमाण को भी उद्धृत किया है तथा वृत्र और इन्द्र के युद्ध का वास्तविक अभिप्राय भी प्रस्तुत किया है। निरुक्त में इतिहास के सम्बन्ध में यास्क से लेकर दुर्गाचार्य पर्यन्त नैरूक्तों के मतों को इस अध्याय में दर्शाया है।

 

इस पुस्तक का तृतीय अध्याय देवापि और शान्तनु के आख्यान का वास्तविक स्वरुप है, इसमें नैरुक्तिक प्रक्रिया से देवापि और शान्तनु के वास्तविक अभिप्राय को स्पष्ट किया है।

 

इस पुस्तक का चतुर्थ अध्याय अष्टाध्यायी और काशिका के सम्बन्ध में संस्कृत में एक विस्तृत भूमिका सहित लेख है।

 

पंचम अध्याय में अष्टाध्यायी की प्रथमावृत्ति की भूमिका को लिखा गया है तथा सरलतम विधि से संस्कृत के पठन-पाठन विधि की विशेषताओं का वर्णन किया है।

 

इस पुस्तक के इस भाग की समाप्ति आर्याभिविनय और संध्योपासना की भूमिका के साथ की गई है।

 

इस भाग में अनेकों लेखों का सङ्ग्रह है। जिनमें ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी द्वारा विभिन्न वेदसम्मेलनों में दिये गये वक्तव्यों का भी सङ्ग्रह किया गया है जो कि लाहौर, कलकत्ता, खुरजा, मेरठ आदि स्थानों पर हुए थे। यह वक्तव्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

 

इसके पश्चात् जिज्ञासु जी द्वारा वेदवाणी पर दिये गये वक्तव्यों का संग्रह किया गया है। जिसके अन्तर्गत सायणाचार्य की वेदार्थ के सम्बन्ध में भूल को उल्लेखित किया है। महर्षि दयानन्द जी के वेदभाष्य की विशेषता को दर्शाया है। वेद और उसकी शाखाओं और ब्राह्मणों का आपसी सम्बन्ध स्पष्ट किया है। महर्षि दयानन्द के वेदार्थ में योगदान का वर्णन किया है। महर्षि दयानन्द के वेदार्थ प्रक्रिया पर लगने वाले कुछ आक्षेपों का समाधान दिया गया है। वेद मन्त्रों के विनियोगों का वर्णन किया है। वेदार्थ प्रक्रिया के मूलभूत सिद्धान्तों का उल्लेख किया है।

इसमें एक अध्याय पाश्चात्य संस्कृत विद्वानों की भूलों पर है। वेदवाणी में प्रकाशित जिज्ञासु जी के विभिन्न लेखों का सङ्ग्रह पुस्तक में किया गया है जिसमें वेद और ईश्वर का सम्बन्ध, संस्कार विधि पर किये गये आक्षेपों के सम्बन्ध में वक्तव्य को उद्धृत किया है। अयन्त इध्म आत्मा की मार्मिक व्याख्या की गई है। वेदों के अलावा समसामयिक विषयों पर भी अनेकों लेखों का इस भाग में सङ्ग्रह किया गया है।

 

यह दोनों भाग अध्ययन और अनुसंधान की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है तथा इनके अध्ययन से वेदार्थ और निरुक्त सम्बन्धित अनेकों शङ्काओं का समाधान हो जाता है तथा वेदार्थ के मूलभूत सिद्धान्तों का परिज्ञान होता है।