गुरु विरजानन्द दण्डी जीवन एवं दर्शन

Share this product

120.00 Rs.

Compare
SKU: book00553 Categories: ,

Product Description

पुस्तक का नाम – गुरु विरजानन्द दण्डी जीवन एवं दर्शन
लेखक का नाम – डॉ. रामप्रकाश

आर्य जाति के पतन का जो मुख्य कारण है, वह है अनार्ष ग्रन्थों का प्रचलन और आर्ष ग्रन्थों की उपेक्षा। इन अनार्ष ग्रन्थों के प्रचलन से भारतवर्ष में अनेकों कुरूतियों का प्रचलन हो गया था। अपने स्वार्थ, प्रतिष्ठा के लिए कई लोग वेद विरुद्ध ग्रन्थों की रचना कर रहे थे तथा आर्ष पद्धति का लोप करने लगे थे। इसका एक उदाहरण भट्टोजि दीक्षित के समय प्रचलित निम्न श्लोक से मिलता है –
“कौमुदी यदि नायाति वृथा भाष्ये परिश्रमः।
कौमुदी यदिह्मायाति वृथा भाष्ये परिश्रमः।।”
अर्थात् यदि कौमुदी का ज्ञान नहीं है, तो पतञ्जलि कृत महाभाष्य पर श्रम व्यर्थ है। यदि कौमुदी का ज्ञान है तो महाभाष्य पर श्रम करना ही व्यर्थ है।
इस तरह के श्लोकों द्वारा स्वरचित ग्रन्थों की प्रतिष्ठा की गई। इतना ही नहीं कुछ लोगों नें ऋषियों के नाम से झुठे ग्रन्थ भी बना लिये थे। इसका दुष्प्रभाव यह हुआ कि साधारण जन तो छोड़े विद्वान भी आर्ष-अनार्ष में भेद करना भूल गए थे।

सर्वप्रथम आर्ष-अनार्ष में भेद कर आर्ष पद्धति के प्रचलन का श्रेय पंडित विरजानन्द दण्डी जी को जाता है। गुरु विरजानन्द दण्डी ने अष्टाध्यायी और महाभाष्य के अध्ययन की परम्परा को चालू किया तथा कौमुदी आदि ग्रन्थों को त्याज्य घोषित किया। इस सम्बन्ध में उन्होनें निम्न श्लोक की भी रचना की, जो निम्न प्रकार है –
“अष्टाध्यायीमहाभाष्ये द्वे व्याकरणपुस्तके।
ततोऽन्यत् पुस्तकं यत्तु तत्सर्वं धूर्तचेष्टितम्।।”
अर्थात् अष्टाध्यायी तथा महाभाष्य ही व्याकरण की दो पुस्तकें हैं। इनसे अन्य जो पुस्तकें है, वो सब धूर्तों की चेष्टाएँ हैं।
विरजानन्द जी दण्डी जी का मानना था कि आर्ष ग्रन्थों के प्रचार-प्रसार से ही भारत की कुरीतियाँ मिट सकती है। अतः विरजानन्द जी ने अपने गुरुकुल में शिष्यों को आर्ष ग्रन्थों के पठन-पाठन को करवाया और अनार्ष ग्रन्थों को नदियों में विसर्जन करवाया। उनके इसी कार्य को उच्च स्तर पर उनकें शिष्य स्वामी दयानन्द जी सरस्वती ने किया।

दण्डी जी के देहावसान के लगभग पाचास वर्ष बाद तक उनका कोई स्वतंत्र जीवन-चरित्र नहीं लिखा गया था। सर्वप्रथम महर्षि दयानन्द जी ने पूणे प्रवचन में कुछ वाक्यों में उनकी श्रद्धापूर्वक चर्चा की थी। इसके पश्चात् जगन्नाथ भारतीय तथा मांगीलाल कविकिंकर ने उसी आधार पर चन्द वाक्यों में दण्डी जी का स्मरण किया। इसी तरह पंडित लेखराम आदि जीवनीकारों ने कुछ-कुछ उल्लेख अपनी पुस्तकों में किया किन्तु उनका स्वतंत्र जीवन चरित्र नहीं लिखा गया।

स्वामी वेदानन्द जी तीर्थ और पण्डित भीमसेन शास्त्री जी ने दण्डी जी के जीवन-चरित क्रमशः 1954 तथा 1959 ई. में लिखे थे। इन सभी विवरणों और कुछ नई खोजों के आधार पर प्रस्तुत पुस्तक लिखी गई है।

प्रस्तुत पुस्तक में दण्डीजी के जन्मस्थान, वंशावली, अलवर गमन, शिष्य मण्डली, लेखों एवं पुस्तकों, मान्यताओं तथा चिन्तन सम्बन्धी पर्याप्त सामग्री है। इस प्रकार पण्डित लेखराम, देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, स्वामी वेदानन्द तथा भीमसेन शास्त्री द्वारा लिखित जीवन-चरितों में जो अधूरापन है, उसे दूर किया गया है।
प्रस्तुत पुस्तक में संग्रहीत नई सामग्री से ऋषि दयानन्द सरस्वती के 1806-68 ई. तक के चिन्तन एवं विचारों की गरिमयता को समझने में सहायता मिलेगी।

आशा है कि इस जीवन चरित के अध्ययन से पाठकों को विरजानन्द जी के पद चिह्नों पर चलने की प्रेरणा प्राप्त होगी।