दयानन्द ग्रन्थमाला

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ग्रन्थ का नाम – दयानन्द ग्रन्थमाला

स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने कुरूतियों के खण्डन और वेदों के मण्डन के लिए, इस मानव समाज को अनेकों ग्रन्थ रूपी मोती प्रदान किये हैं। इन मोतियों को एक साथ सम्मलित करके माला का रूप दिया गया है। प्रस्तुत ग्रन्थ स्वामी जी के अनेकों ग्रन्थ रूपी मोतियों की माला “दयानन्द ग्रन्थ माला” है।

यह ग्रन्थमाला 3 भागों में है। इसमें स्वामी दयानन्द जी प्रदत्त निम्न मोतियों का सङ्ग्रह किया गया है।
1) दयानन्द ग्रन्थमाला – 1 में – सत्यार्थ प्रकाश
2) दयानन्द ग्रन्थमाला -2 में –
– ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका
– भागवत-खण्डनम्
– पञ्चयज्ञविधिः
– वेदभाष्य के नमूने का अङ्क
– वेदविरूद्धमतखण्डनः
– वेदान्त-ध्वान्त-निवारणम्
– आर्याभिविनयः
– आर्योद्देश्यरत्नमाला
– भ्रान्ति-निवारण
– जन्म-चरित्र
3) दयानन्द ग्रन्थमाला -3 में –
– संस्कारविधि
– संस्कृतवाक्यप्रबोधः
– व्यवहारभानु
– भ्रमोच्छेदन
– अनुभ्रमोच्छेदन
– गोकरुणानिधि
– काशीशास्त्रार्थः
– हुगली-शास्त्रार्थ
– सत्यधर्मविचारः
– शास्त्रार्थ-जालन्धर
– शास्त्रार्थ-बरेली
– शास्त्रार्थ-उदयपुर
– शास्त्रार्थ-अजमेर
– शास्त्रार्थ मसूदा
– कलकत्ता-शास्त्रार्थ
– उपदेश मञ्जरी
– आर्यसमास के नियम
– आर्यसमास के नियमोपनियम(स्वीकार-पत्र)
इन भागों के ग्रन्थों का संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है –
सत्यार्थ प्रकाश – यह दयानन्द ग्रन्थमाला का पहला मोती है। यह ग्रन्थ अति प्रसिद्ध है और वर्तमान में युवावर्ग इस ग्रन्थ को विशेष पसंद करता है, क्योंकि इसमें धर्म को तर्क-विज्ञान और दर्शनों की कसौटी पर परखने की प्रेरणा दी गई है। इसमें निम्न विषय है –
(क) प्रथम समुल्लास में ईश्वर के ओङ्काराऽऽदि नामों की व्याख्या है।
(ख) द्वितीय समुल्लास में सन्तानों की शिक्षा के विषय में है।
(ग) तृतीय समुल्लास में ब्रह्मचर्य, पठन-पाठनव्यवस्था, सत्यासत्य ग्रन्थों के नाम और पढ़ने-पढ़ाने की रीति का वर्णन है।
(घ) चतुर्थ समुल्लास में विवाह और गृहाश्रम के व्यवहारों का वर्णन है।
(ङ) पञ्चम समुल्लास में वानप्रस्थ और सन्यासाश्रम की विधि का उल्लेख है।
(च) छठे समुल्लास में राजधर्म का वर्णन है।
(छ) सप्तम समुल्लास में वेदेश्वर विषय समझाया गया है।
(ज) अष्टम समुल्लास में जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय का वर्णन है।
(झ) नवम समुल्लास में विद्या, अविद्या, बन्ध और मोक्ष की व्याख्या है।
(ञ) दशवें समुल्लास में आचार, अनाचार, भक्ष्याभक्ष्य विषय का उल्लेख है।
(ट) एकादश समुल्लास में आर्य्यावर्त्तीय मतमतान्तर का खण्डन-मण्डन किया है।
(ठ) द्वादश समुल्लास में चार्वाक, बौद्ध और जैनमत का खण्डन किया है।
(ड) त्रयोदश समुल्लास में ईसाई मत का खण्डन किया है।
(ढ) चौदहवें समुल्लास में मुसलमानों के मत का खण्डन है।
इन चौदह अध्यायों के पश्चात् आर्यों के सनातन मत की विशेषतः व्याख्या लिखी है।

इस ग्रन्थ माला के दूसरे भाग का प्रथम मोती है – ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका
इस ग्रन्थ में निम्न विषय है –
(क) अध्याय 1 – इसमें ईश्वर की प्रार्थना विषय का वर्णन है।
(ख) अध्याय 2 – इसमें वेदोत्पत्ति के विषय में प्रकाश डाला है।
(ग) अध्याय 3 – इस अध्याय में सिद्ध किया है कि वेद नित्य है।
(घ) अध्याय 4 – इस अध्याय में वेदविषयों पर विचार प्रकट किया है। वेदों से एकेश्वरवाद को प्रस्तुत किया है। विज्ञानकाण्ड और कर्मकाण्ड विषय को समझाया है। देवता शब्द की मीमांसा और देव संख्या का निर्णय किया है। मोक्षमूलर के मत का खण्डन किया गया है।
(ङ) अध्याय 5 – इस अध्याय में वेद संज्ञा पर विचार किया है।
(च) अध्याय 6 – इस में वेदों में वर्णित ब्रह्म विद्या का उल्लेख किया है।
(छ) अध्याय 7 – इस अध्याय में वेदोक्त धर्म का विवेचन किया है।
(ज) अध्याय 8 – इसमें सृष्टि उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय पर प्रकाश डाला है। इस अध्याय में पुरूष सूक्त की व्याख्या की गई है।
(झ) अध्याय 9 – इस अध्याय में पृथिव्यादिलोकभ्रमण विषय पर प्रकाश डाला है।
(ञ) अध्याय 10 – इस अध्याय में ग्रहादि के मध्य आकर्षण-अनुकर्षण को वेद प्रमाणों से प्रस्तुत किया है।
(ट) अध्याय 11 – इस अध्याय में प्रकाशक और अप्रकाशक लोकों का वर्णन किया है।
(ठ) अध्याय 12 – इस अध्याय द्वारा बताया है कि वेदों में गणित विद्या का मूल है।
(ड) अध्याय 13 – इस अध्याय में ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और समर्पण विषय का वर्णन है।
(ढ) अध्याय 14 – इस अध्याय में उपासना विधि पर प्रकाश डाला है।
(ण) अध्याय 15 – इस अध्याय में मुक्ति और मुक्ति से पुनरावर्ति का विवेचन किया है।
(त) अध्याय 16 – इस अध्याय में वेदों से नौकायन, विमान विद्या का मूल दर्शाया है।
(थ) अध्याय 17 – इस अध्याय में तार और संचार विद्या का मूल वेदों से दर्शाया है।
(द) अध्याय 18 – इस अध्याय में वेदों से आयुर्वेदादि चिकित्सा विज्ञान का मूल दर्शाया है।
(ध) अध्याय 19 – इस अध्याय में पुनर्जन्म का वेदों और दर्शनों के प्रमाण से स्पष्टीकरण किया गया है।
(न) अध्याय 20 – इस अध्याय में विवाह विषय को लिखा गया है।
(ऩ) अध्याय 21 – इस अध्याय में नियोगादि विषय को लिखा है।
(प) अध्याय 22 – इस अध्याय में राजा और प्रजा के कर्तव्यों का उल्लेख किया है।
(फ) अध्याय 23 – इस अध्याय में वर्णाश्रम धर्म का वर्णन है।
(ब) अध्याय 24 – इस अध्याय में पाँच महायज्ञों जैसे – अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, बलिवैश्वदेवयज्ञ और अतिथियज्ञ का वर्णन है।
(भ) अध्याय 25 – इस अध्याय में आर्ष अनार्ष ग्रन्थों का वर्णन, वैदिक आख्यानों का शुद्धार्थ पर प्रकाश डाला है।
(म) अध्याय 26 – इस अध्याय में वेदों के अधिकारी एवं अनाधिकारी का उल्लेख किया है।
(य) अध्याय 27 – इसमें पठन-पाठन विधि का वर्णन है।
(र) अध्याय 28 – इस अध्याय में वेदों के भाष्य करने की विधि, शङ्काओं का समाधान आदि का निरूपण है तथा सायण और महीधर के भाष्यों का खण्डन किया है।
(ऱ) अध्याय 29 – इस अध्याय में वेदभाष्य करने की शैली और विषयों के सम्बन्ध में की हुई प्रतिज्ञा का वर्णन है।
(ल) अध्याय 30 – इस अध्याय में वेदार्थ सम्बन्धित विविध प्रश्नोत्तर का निरूपण है।
(ळ) अध्याय 31 – इस अध्याय में वैदिक-प्रयोग का नियम प्रस्तुत किया है।
(ऴ) अध्याय 32 – इस अध्याय में वेदों में प्रयुक्त उदात्त, अनुदात्त और स्वरित तथा षडाजादि सप्त स्वरों का निरूपण किया है।
(व) अध्याय 33 – इस अध्याय में व्याकरण नियमों का वर्णन है।
(श) अध्याय 34 – इस अध्याय में वेदों में प्रयुक्त रूपकादि अलङ्कारों का वर्णन किया है।
(ष) अध्याय 35 – इस अध्याय में वेद भाष्यों में प्रयुक्त ग्रन्थों के संकेतों का स्पष्टीकरण किया है।

इस द्वितीय भाग की माला का दूसरा मोती है – भागवत खण्डनम्
भागवत-खण्डनम् – यह ग्रन्थ चिर काल से अनुपलब्ध था, इसे युद्धिष्ठिर मीमांसक जी ने खोजकर प्रकाशित करवाया था इसमें वैष्णव भागवत का खण्डन किया गया है।

इसका तीसरा मोती है – पञ्चमहायज्ञ विधि
पञ्चमहायज्ञ विधि – इस ग्रन्थ में नित्य कर्तव्य पांच यज्ञों की विधि का वर्णन है वे पांच यज्ञ निम्न है –
(1) ब्रह्मयज्ञ – इसे सन्ध्योपासना कहते हैं। इसमें ईश्वर की उपासना की विधि का वर्णन किया है।
(2) देवयज्ञ – इसे अग्निहोत्र कहते है। इसको वातावरण की शुद्धि के उद्देश्य से विविध द्रव्यों द्वारा मन्त्रोच्चारण के साथ किया जाता है।
(3) पितृयज्ञ – इसमें अपने माता – पिता, शिक्षक और अन्य बुजुर्गों की सेवा करने का उपदेश और विधि है।
(4) बलिवैश्वदेव यज्ञ – इस यज्ञ में गौ से लेकर क्षुद्र जीवों को भोज्य पदार्थ रखने का नियम किया है।
(5) अतिथि यज्ञ – इस यज्ञ में अतिथि सेवा का विधान किया है।

इस माला में चतुर्थ मोती वेदभाष्य के नमूने अंक है।
वेदभाष्य के नमूने का अंक – इसमें स्वामी जी ने अपने द्वारा किये हुए वेद मन्त्रों के भाष्यों को प्रस्तुत किया है, इसमें ऋग्वेद के आग्नेय सूक्त के प्रथम मन्त्र से नवें मन्त्रों के भाष्य है।

इस ग्रन्थमाला का पंचम मोती वेदविरूद्धमत खण्डनम् है।
वेदविरूद्धमत खण्डनम् – इस ग्रन्थ में स्वामी जी ने वल्लभमत का खण्डन किया है। इसमें वल्लभमत के सभी सिद्धान्तों व ग्रन्थों को लेकर उनमें से प्रश्न उठाकर उनका खण्डन किया है। इस खण्डनात्मक ग्रन्थ को स्वामी जी ने संस्कृत में लिखा था जिसका गुजराती और हिन्दी में अनुवाद क्रमशः श्याम जी कृष्ण वर्मा और भीमसेन शर्मा ने किया।

इस ग्रन्थमाला में षष्ठं मोती वेदान्तिध्वान्त-निवारणम् है।
वेदान्तिध्वान्त निवारण – यह ग्रन्थ स्वामी जी ने नवीन वेदान्तियों अर्थात् अद्वैतवाद के खण्डन में लिखा था।
पं. देवेन्द्रनाथ जी द्वारा रचित महर्षि के जीवनचरित्र से इस पुस्तक के लेखन में दो बातें प्रकट होती है –
1) आश्चर्य की बात है कि अद्वैतवाद के खण्डन विषयक यह पुस्तक महर्षि ने घोर अद्वैतवादी कृष्णराम इच्छाराम जी से लिखवाई थी।
2) महर्षि ने इस पुस्तक का लेखन दो ही दिनों में समाप्त भी कर दिया था।

इस ग्रन्थमाला का सप्तम मोती शिक्षापत्रीध्वान्त निवारण है।
शिक्षापत्रीध्वान्त निवारणम् – यह ग्रन्थ सहजानन्द द्वारा प्रतिपादित नारायण मत का खण्डन करने के लिए लिखा गया था।

इस ग्रन्थमाला का अष्टम मोती आर्याभिविनय है।
आर्याभिवनय – इस ग्रन्थ में महर्षि ने ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान कराया है। वेदों के मूल मन्त्रों का हिन्दी भाषा में व्याख्यान करके ईश्वर के स्वरूप का बोध कराया है। ईश्वर के स्वरूप के साथ-साथ परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना तथा धर्मादि विषयों का भी वर्णन है।

इस ग्रन्थमाला का नवम मोती आर्योद्दे्श्यरत्नमाला है।
आर्योद्देश्यरत्नमाला – इस ग्रन्थ में महत्त्वपूर्ण व्यवहारिक शब्दों की परिभाषाएँ प्रस्तुत की गई हैं, जो वेदादि शास्त्रों पर आधारित हैं। इसमें 100 मन्तव्यों का सङ्ग्रह है।

इस ग्रन्थमाला का दशम मोती भ्रान्ति-निवारण है।
भ्रान्ति निवारण – इस पुस्तक में प्रस्तुत उत्तर कलकत्ता के संस्कृत कालेज के आँफिशियेटिंग प्रिंसिपल पण्डित महेशचन्द्र न्यायरत्न द्वारा उठाई गई भ्रान्तियों का निवारण है। इसमें वेदभाष्य सम्बन्धित भ्रान्तियों का निदान किया है।

इस ग्रन्थमाला का ग्यारहवाँ मोती स्वरचित जीवन-चरित्र है।
स्वरचित जीवन-चरित्र – यह स्वामी जी द्वारा अपने पूना व्याख्यान में कथन किया हुआ जीवन-चरित्र है। यह मराठी से हिन्दी में 1869 ई. में अनूदित हो कर प्रकाशित हुआ था।

इस ग्रन्थमाला के तीसरे भाग का प्रथम मोती संस्कार विधि है।
संस्कार विधि – इस ग्रन्थ में स्वामी जी ने वेदादि शास्त्रों से युक्त आर्यों के 16 संस्कारों का वर्णन किया है, जो निम्न प्रकार है –
1 गर्भाधान संस्कार 2 पुंसवनम् 3 सीमन्तोन्नयनम् 4 जातकर्म संस्कार 5 नामकरण संस्कार 6 निष्क्रमण संस्कार 7 अन्नप्राशन संस्कार 8 चूडाकर्म संस्कार 9 कर्णवेध संस्कार 10 उपनयन संस्कार 11 वेदारम्भ संस्कार 12 समावर्तन संस्कार 13 विवाह संस्कार 14 वानप्रस्थ संस्कार 15 संन्यासाश्रम संस्कार 16 अन्त्येष्टि संस्कार

इस ग्रन्थमाला का दूसरा मोती संस्कृतवाक्यप्रबोध है।
संस्कृत वाक्यप्रबोधः – इस ग्रन्थ को स्वामी जी ने इसलिए बनाया कि संस्कृत सम्भाषण के लिए विद्यार्थियों में उत्साहवर्धन होवें।

इस ग्रन्थमाला का तृतीय मोती व्यवहारभानु है।
व्यवहारभानु – इस ग्रन्थ में स्वामी जी ने मनुष्यों के यथायोग्य व्यवहारों का वर्णन किया है। इस ग्रन्थ में तरह-तरह के रोचक दृष्टान्तों का सङ्ग्रह है।

इस ग्रन्थमाला का चतुर्थ मोती भ्रमोच्छेदन है।
भ्रमोच्छेदन – इस ग्रन्थ में स्वामी जी ने राजा शिवप्रसाद द्वारा उठाये गए भाष्यभूमिका पर आश्रेपों का खण्डन किया है।

इस ग्रन्थमाला का पंचम मोती अनुभ्रमोच्छेदन है।
अनुभ्रमोच्छेदन – महर्षि दयानन्द ने राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द के निवेदन पत्र के उत्तर में भ्रमोच्छेदन ग्रन्थ की रचना की थी। तब इसके उत्तर में राजा शिवप्रसाद ने पुनः द्वितीय निवेदन नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसके उत्तर में यह “अनुभ्रमोच्छेदन” नामक ग्रन्थ लिखा गया।
यह ग्रन्थ स्वामी जी ने अपने शिष्य भीमसेन शर्मा से लिखवाया था।

इस ग्रन्थमाला का षष्ठं मोती गोकरूणानिधि है।
गोकरूणानिधि – इस ग्रन्थ में स्वामी जी ने गो रक्षा का उपदेश किया है।

इस ग्रन्थमाला का सप्तम मोती काशीशास्त्रार्थ है।
काशीशास्त्रार्थ – इस ग्रन्थ में स्वामी जी द्वारा मुर्तिपूजा विषय पर पौराणिक पक्ष से हुए शास्त्रार्थ का वर्णन है। इसमें पौराणिक पंडित वेदों से प्रतिमा पूजन और पुराण शब्द सिद्ध नहीं कर पाये।

इस ग्रन्थमाला का अष्टम मोती हुगली शास्त्रार्थ है।
हुगली शास्त्रार्थ – यह शास्त्रार्थ स्वामी दयानन्द जी और पं. ताराचन्द तर्करत्न के मध्य हुगली नामक स्थान पर मुर्ति पूजा विषय पर हुआ था।

इस ग्रन्थमाला का नवम मोती सत्यधर्मविचार है।
सत्यधर्मविचार – यह मेला चांदापुर में हुई एक धर्म्मंचर्चा थी। इस चर्चा में ईसाई और मुस्लिम पक्ष के विद्वान सम्मलित थे।
इस मेले में निम्न विषयों पर चर्चाऐं हुई –
1 सृष्टि को परमेश्वर ने किस वस्तु से, किस समय और किसलिए बनाया?
2 ईश्वर सबमें व्यापक है या नहीं?
3 ईश्वर न्यायकारी और दयालु किस प्रकार है?
4 वेद, बाईविल और कुरान में ईश्वरोक्त होने में क्या प्रमाण है?
5 मुक्ति क्या है?

इस ग्रन्थमाला का दसवाँ मोती शास्त्रार्थ जालन्धर है।
शास्त्रार्थ जालन्धर – यह शास्त्रार्थ स्वामी दयानन्द जी और मौलवी अहमद हुसैन के मध्य हुआ। यह ईश्वर के चमत्कार और पुनर्जन्म विषय पर हुआ।

इस ग्रन्थमाला का ग्यारहवाँ मोती सत्यासत्य विवेक है।
सत्यासत्य विवेक – इसे बरेली शास्त्रार्थ भी कहते है। यह शास्त्रार्थ स्वामी दयानन्द सरस्वती जी और पादरी टी.जी. स्काट के मध्य बरेली, राजकीय पुस्तकालय नामक स्थान पर हुआ। यह शास्त्रार्थ तीन दिनों तक हुआ, इसमें निम्न विषयों पर चर्चाएं हुई –
1 आवागमन
2 ईश्वर कभी देह धारण करता है या नहीं?
3 ईश्वर अपराध क्षमा करता है या नहीं?

इस ग्रन्थमाला का बारहवां मोती शास्त्रार्थ उदयपुर है।
शास्त्रार्थ उदयपुर – यह शास्त्रार्थ लिखित रूप में मौलवी अब्दूल रहमान और महर्षि दयानन्द के मध्य हुआ था। इस शास्त्रार्थ में निम्नलिखित विषय थे –
1 इलहामी पुस्तक कौन-सी है? संसार के सब मनुष्य एक ही जाति के हैं वा कई जातियों के? मनुष्य की उत्पत्ति कब से है और अन्त कब होगा?
2 वेद किसकी रचना है? पुराण, मत की पुस्तक हैं या विद्या की?
3 वेद में अन्य धर्मों की पुस्तकों से क्या विशेषता है?

इस ग्रन्थमाला का तेरहवां मोती शास्त्रार्थ अजमेर है।
शास्त्रार्थ अजमेर – यह शास्त्रार्थ स्वामी दयानन्द जी और पादरी ग्रे के मध्य किरानी मत खण्डन विषय पर हुआ था।

इस ग्रन्थमाला का चौदहवां मोती शास्त्रार्थ मसूदा है।
शास्त्रार्थ मसूदा – इस शास्त्रार्थ के तीन चरण है –
1) जैन साधु सिद्धकरण और स्वामी जी के प्रश्नोत्तर।
2) बाबू बिहारीलाल ईसाई के साथ राव साहब बहादुर सिहं जी का स्वामी दयानन्द जी की मध्यस्थता में शास्त्रार्थ।
3) एक कबीर पंथी से प्रश्नोत्तर।

इस ग्रन्थमाला का पन्द्रहवाँ मोती शास्त्रार्थ कलकत्ता है।
कलकत्ता शास्त्रार्थ – यह शास्त्रार्थ लिखित रूप में था इसमें पौराणिक पक्ष द्वारा लगाये गये आक्षेपों का उत्तर स्वामी जी ने अन्य विद्वानों से लिखवाया था।

इस ग्रन्थमाला का सौलहवां मोती उपदेश मंजरी है।
उपदेश मंजरी – यह स्वामी जी द्वारा दिए गए पूना प्रवचनों का संङ्ग्रह है। इस ग्रन्थ में निम्न पन्द्रह व्याख्यान है –
1 ईश्वर सिद्धि
2 ईश्वर सिद्धि का वाद-विवाद
3 धर्माधर्म
4 धर्माधर्म विजय पर शङ्का-समाधान
5 वेद
6 पुनर्जन्म
7 यज्ञ और संस्कार
8-13 इतिहास
14 नित्य कर्म और मुक्ति
15 स्वयं कथित जीवन चरित्र

इस ग्रन्थमाला का सत्रहवां और अन्तिम मोती आर्यसमाज के नियमोपनियम।
आर्यसमाज के नियमोपनियम – इसमें स्वामी जी द्वारा स्थापित आर्यसमाज के नियमों का सङ्कलन है। जिसमें आर्यसमाज के मुख्य दस नियम के साथ-साथ आर्य्यसभासद् के नियम, सभाओं के प्रकार का विवरण, सभाओं के कार्य और अधिकारी, प्रधान, उपप्रधान,मन्त्री, कोषाध्यक्ष, पुस्तकाध्यक्ष के नियमों का उल्लेख किया है।
इसके पश्चात् अन्त में स्वामी जी के स्वीकारपत्र की प्रति सम्मलित की गई है।

स्वामी जी के मोतियों से बनी इस माला को प्रत्येक व्यक्ति को पढ़कर लाभान्वित होना चाहिए और इसका अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार करना चाहिए।