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चरक संहिता (डॉ.ब्रह्मानन्द त्रिपाठी)

Name/नामCharak Sahita(Vol 1 & 2)
Author-Editor/लेखक-संपादकDr. Brahmanand Tripathi
Language/भाषाHindi
Edition/संस्करण 
Size/आकार 
Publisher/प्रकाशकChaukhamba Sanskrit Pratisthan , Varanasi
Publication Year/प्रकाशन वर्ष 
Pages/पृष्ठ 
Binding Style/बंधन शैलीHard Cover
ISBN/SKUbook00151

 

 

महर्षि चरक

चरक महान् आयुर्वेदाचार्य थे। आप कुषाण सम्राट् कनिष्क प्रथम के राजवैद्य थे। कनिष्क प्रथम का काल सन 200 का है। आप का जन्म शल्यक्रिया के जनक महर्षि सुश्रुत तथा व्याकरणाचार्य महर्षि पत´्जलि के भी पूर्व हुआ है। आपका प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘चरक संहिता’ है। इस ग्रन्थ का मूल पाठ वैद्य अग्निवेश ने लिखा था। चरक जी ने उसमें संशोधन कर तथा उसमें नए प्रकरण जोड़ कर उसे अधिक उपयोगी एवं प्रभावशाली बनाया।

आपने आयुर्वेद के क्षेत्र में अनेक शोध किए तथा अनेकों संशोधन आलेख लिखे, जो बाद में चरक संहिता नाम से प्रसिद्ध हुई। चरक संहिता मूल में संस्कृत भाषा में लिखी गई है। वर्तमान में उसका हिन्दी अनुवाद भी उपलब्ध होता है। आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करने के लिए यह ग्रन्थ अत्यन्त उपयोगी होने से इसे पाठ्यक्रम में भी स्थान दिया गया है।

चरक संहिता के आठ विभाग हैं। 1) सूत्रस्थान, 2) निदानस्थान, 3) विमानस्थान, 4) शरीरस्थान, 5) इन्द्रियस्थान, 6) चिकित्सास्थान, 7) कल्पस्थान एवं 8) सिद्धिस्थान। इन आठ विभागों में शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों की बनावट, वनस्पतियों के गुण तथा परिचय आदि का वर्णन है।

महर्षि चरक की यह मान्यता थी कि एक चिकित्सक के लिए महज ज्ञानी या विद्वान् होना ही पर्याप्त नहीं है अपितु उसे दयालु और सदाचारी भी होना चाहिए। चिकित्सक बनने से पूर्व ली जानेवाली प्रतिज्ञाओं का उल्लेख चरक संहिता में मिलता है। वैदिक काल में इन प्रतिज्ञाओं का पालन करना सभी वैद्यों के लिए आवश्यक माना जाता था।

चरक संहिता का अनुवाद अरबी तथा युरोपीय भाषाओं में भी हो चुका है। उन-उन भाषाओं के विद्वानों ने इस ग्रन्थ पर टीकाएं भी लिखी हैं। आयुर्वेद में महर्षि चरक अभूतपूर्व योगदान के लिए ही आपको आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान के महान् सम्राट् की उपाधी से सम्मानित किया गया था।

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Product Description

पुस्तक का नाम – चरक संहिता (दो भागों में सम्पूर्ण )

लेखक – डॉ.ब्रह्मानन्द त्रिपाठी

वेदों के उपवेद आयुर्वेद का महत्व हम सभी जानते है | आयुर्वेद केवल शरीर की चिकित्सा ही नही मन की भी चिकित्सा का विधान करता है | केवल औषधि द्वारा रोग की रोकथाम तक सीमित नही है बल्कि व्यक्ति व्यवहार ,आचरण और दिनचर्या का भी विधान करता है | चरक संहिता मूल रूप में महर्षि अग्निवेश कृत थी जिसे बाद में चरक और दृढबल ने प्रतिसंस्कृत किया | इस ग्रन्थ के अध्ययन से पता लगता है कि अपनी आप्तबुद्धि और क्रान्तिदर्शी प्रतिभा से ऋषियों ने जिन आधारभूत सूत्रों का निर्देश किया वे आज भी चिकित्सा सिद्धांतों के मानदंड को स्थापित करने में सक्षम है | इन महान विभूतियों के ऐसे ग्रंथों से हमे हमारे गौरवशाली अतीत की झलक मिलती है | प्रस्तुत व्याख्या हिंदी अनुवाद में होने से यह हिंदी समझने वाले पाठकों के लिए विशेष साहयक और उपयोगी है | इस पुस्तक में विस्तृत भूमिका द्वारा लेखक ने आयुर्वेद का इतिहास और अग्निवेश चरक आदि के काल का निर्णय आदि विषयों पर अपने विचार प्रकट किये है | विविध मान तालिकाएँ इस पुस्तक में दी है जिससे प्राचीन काल में प्रयुक्त मात्रक मानों का ज्ञान होगा | यह पुस्तक दो भागों में है प्रथम भाग में सूत्र स्थान ,विमान स्थान ,इन्द्रिय स्थान है | द्वितीय भाग में चिकित्सा स्थान ,कल्प, सिद्धि स्थान है | इस पुस्तक में यथा सम्भव चरक के गूढ़ स्थलों को प्रकट करने का प्रयास किया है | स्थल विशेष पर पारिभाषिक शब्दों के अंग्रेजी नाम दिए है | आवश्यकतानुसार प्रकरण विशेष पर आधुनिक चिकित्सा सिद्धांतों से तुलनात्मक दृष्टि से भी समावेश कर दिया गया है,जिससे पाठकों को विषय समझने में सुविधा हो साथ ही कठिन स्थलों को विशेष वक्तव्य तथा टिप्पणियों द्वारा प्राञ्जल किया गया है | शोधार्थियों और हिंदी भाषाई आयुर्वेद प्रेमियों के लिए यह ग्रन्थ अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा |