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चरक संहिता (डॉ. लक्ष्मीधर द्विवेदी)

ग्रन्थ का नाम – चरक संहिता

अनुवादक का नाम – डॉ. लक्ष्मीधर द्विवेदी

 

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ग्रन्थ का नाम – चरक संहिता

अनुवादक का नाम – डॉ. लक्ष्मीधर द्विवेदी

विश्व के प्राचीनतम वैज्ञानिकता पर आधारित चिकित्सा शास्त्र आयुर्वेद है। वेदों को प्राचीनतम ग्रन्थ के रुप में स्वीकार किया गया है। इन्हीं वेदों का उपवेद आयुर्वेद है। वेदों में विशेषरूप से अथर्ववेद में आयुर्वेद का अधिक उल्लेख है। वेदों में जो चिकित्सक विषयक सामग्री का बीजरुप है, उसी का आयुर्वेद में विस्तार प्राप्त होता है।

आयुर्वेद में मुख्यतः दो ग्रन्थ अधिक मान्य और आर्ष माने गये हैं, जिनके नाम क्रमशः चरक संहिता और सुश्रुत संहिता है।

इनमें चरक संहिता के उपदेशक महर्षि अग्निवेश है तथा इस ग्रन्थ के प्रतिसंस्कारक अचार्य चरक और दृढ़बल है। इस ग्रन्थ की विषय वस्तु निम्न प्रकार है –

चरक संहिता में सूत्र-निदान-विमान-शरीर-इन्द्रिय-चिकित्सा-कल्प व सिद्धि नाम से आठ स्थान हैं। ये आठ स्थान विषय वस्तुओं का संकेत देते हैं। इसके अतिरिक्त अधुना सामान्य, विशेषादि छः को षडपदार्थ के रुप में स्वीकार किया जाता है, यानि इन्हें आयुर्वेद की विषय वस्तु निर्धारित किया गया है। चरक संहिता सूत्र स्थान 30 में इस आयुर्वेद तंत्र के अर्थ यानि विषयों वस्तुओं को तन्त्रार्थ के रूप में प्रचलित किया गया है – तन्त्रार्थ पुनः स्वलक्षणे रुपदिष्टः। स चार्थः प्रकरणे र्विभाव्यमानो भूय एव शरीरवृत्तिहेतुव्याधिकर्मकालकर्तुकरणविधिविनिश्याद्दशप्रकरणः, तानि च प्रकरणानि केवलेनोपदेक्ष्यन्ते तन्त्रेण।। च.सू.30/32।। आयुर्वेद, शाखा, विद्या, ज्ञानादि के रुप में तन्त्र का लक्षण कह दिया गया है। यदि इस तन्त्र या आयुर्वेद का प्रकरण के अनुसार विचार किया जाता है तो इसके दश प्रकरण हैं – 1 शरीर 2 वृत्ति 3 हेतु 4 व्याधि 5 कर्म 6 काल 7 कार्य 8 कर्त्ता 9 करण 10 विधि। इन्हीं उपर्युक्त दश प्रकरणों का सम्पूर्ण आयुर्वेद में उपदेश किया गया है। यहाँ आयुर्वेद के विषय वस्तुओं को व्यावहारिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। कर्त्ता वैद्य को कहा गया है। करण साधन है तथा विधि तकनीक है।

सम्पूर्ण आयुर्वेद में इन दश से सम्बन्धित उपदेश है विशेषकर चरक संहिता में इन्हीं दश से सम्बन्धित उपदेश प्राप्त होता है।

चरक संहिता में आयुर्वेद का प्रयोजन दो रुपों में प्रस्तुत किया गया है। च. सू. 30 में किमर्थमायुर्वेदः? किसलिए आयुर्वेद का उपदेश हुआ? इसके लिए कहा गया है – प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वाथ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्रशमनं च।। च.शा. 30/26।। इस आयुर्वेद का प्रयोजन स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा तथा रोगी व्यक्तियों के रोग को दूर करना है। पुनः सूत्र स्थान अध्याय 1 में आयुर्वेद स्थापना के सन्दर्भ में कारण – कार्य के व्यवहारिकता दर्शाते हुए इस चरक संहिता का एक सूत्रीय प्रयोजन प्रस्तुत किया गया है – कार्य धातुसाम्य मिहोच्यते। षडपदार्थ रुपी कारणों का कार्य धातु साम्यता है तथा इस चरक संहिता या इस तंत्र का प्रयोजन धातुओं को साम्य करना ही है – धातु साम्य क्रिया चोक्ता तन्त्रात्यास्य प्रयोजनम्। इस प्रकार आयुर्वेद के जो भी विषयवस्तु है या उपर्युक्त दश प्रकरण हैं वे धातु साम्यता से सम्बन्धित है।

प्रस्तुत संस्करण चरक संहिता का ऐसा संस्करण है जिसमें चरक संहिता का हिन्दी में अनुवाद के साथ – साथ श्रीचक्रपाणिदत्तविरचित ‘आयुर्वेददीपिका’ व्याख्या एवं ‘आयुर्वेददीपिका’ की तत्त्वप्रकाशिनी हिन्दी व्याख्या तथा यत्र तत्र श्रीगङ्गाधरकविरत्नकृत ‘जल्पकल्पतरु’ की हिन्दी व्याख्या भी प्रकाशित की गई है।
इस संहिता का हिन्दी अनुवाद तो प्राप्त होता है किन्तु इस पर लिखी टीकाओं का मात्र अंग्रेजी अनुवाद प्राप्त होता है और वो भी शब्दशः प्राप्त नहीं होता है। यह प्रथम ऐसा संस्करण है जिसमें उक्त चक्रपाणिदत्त विरचित आयुर्वेददीपिका का हिन्दी अनुवाद प्राप्त होता है। इस संस्करण में आचार्य चक्रपाणि के क्लिष्ट एवं दुर्बोध्य शब्दों का सरल भाव व सरल अर्थ के रुप में प्रस्तुत किया गया है। इस आयुर्वेददीपिका टीका में अग्निवेश तंत्र, क्षारपाणितन्त्र, जतूकर्ण तन्त्र, पाराशर तन्त्र, हारीत तन्त्र तथा भेल तन्त्र के उदाहरण मिलते हैं जो कि आज लुप्तप्रायः ग्रन्थ है। इनके अतिरिक्त इस टीका में विदेह तन्त्र, शल्य तन्त्र, निमि तन्त्र, भोज संहिता, कार्तिकेय संहिता, पालकाप्यसंहिता, शाहिहोत्र संहिता आदि के उद्धरण मिलते हैं। इसके अतिरिक्त महाभारतगत उद्धरण भी दिये गये हैं। अतः

कई कारणों से चक्रपाणि टीका का अत्यन्त महत्त्व है।

इस संस्करण से पाठक चरक संहिता और उसकी चक्रपाणि विरचित आयुर्वेदरीपिका टीका का लाभ ले सकतें हैं।