अनुप्रयुक्त संस्कृत व्याकरण

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पुस्तक का नाम – अनुप्रयुक्त संस्कृत व्याकरण
लेखक का नाम – मधुसूदन मिश्र
 
संस्कृत भाषा शिक्षण सदियों से प्रयोग का विषय रहा है। प्राचीन पाठशालाओं की पद्धति सन्तोषप्रद थी, क्योंकि संस्कृत से सीधा सम्बन्ध रखा जाता था, लेकिन अब पाठशालायें संस्कृतनिष्ठ नहीं रहीं। आज का कोई छात्र – चाहे पाठशाला से आया हो या कालेज से संस्कृत नहीं बोल सकता है। शायद संस्कृत भाषा वह ठीक – ठीक जानता भी नहीं, क्योंकि भाषा की अपेक्षा साहित्य पढ़ाया जाता है।
 
आजकल विश्वविद्यालयों का पाठ्यक्रम संस्कृतभाषाप्रधान नहीं होकर संस्कृतसाहित्यप्रधान है। अतः हिन्दी या अंग्रेजी के माध्यम से संस्कृत साहित्य की जानकारी प्राप्त कर छात्र उच्चतम उपाधि ले लेता है। संस्कृत भाषा सिखाने के लिये व्याकरण की उपादेयता के प्रति उपेक्षा वाली प्रवृत्ति ने सारा सत्यनाश कर ड़ाला है।
 
आज इस बात की आवश्यकता है कि संस्कृत के पाठ्यक्रम कुछ बदले जायें। संस्कृत शिक्षण की प्राथमिक अवस्था में – चाहे वह शिक्षण कालेज में शुरू हो या स्कूल में – अधिक से अधिक अनेक स्तर के अभ्यास हों। कोई छात्र जहाँ से चाहे वहीं से संस्कृत शिक्षण शुरू करे। यदि पहली बार कोई छात्र वी.ए. में संस्कृत सीखना चाहे तो उसके लिये उसके अनुरूप पाठ्यक्रम हो। यह तभी सम्भव है जब संस्कृत पाठ्यक्रम भाषाप्रधान होगा।
 
प्रस्तुत व्याकरण संस्कृत भाषा शिक्षण को ध्यान में रखकर लिखा गया है। यह कुछ प्रौढ़ तथा कालेज वाले छात्रों के लिये है। इसमें रूपावलि को इस प्रकार से प्रस्तुत नहीं की गयी है कि उन्हें रट लिया जाये। उसे प्रस्तुत करने में रूपों की समानता और असमानता पर ध्यान दिया गया है। मुनि और साधु के रूप एक जैसे चलते हैं : मुनिना साधुना, मुनये साधवे, इत्यादि।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके अभ्यासों में अनुवाद का स्थान नहीं है। इसमें रूपान्तरण की पद्धति अपनायी गयी है, जिससे छात्र का ध्यान संस्कृत के सिवा अन्य भाषा पर नहीं जाता है।
 
आशा है कि यह ग्रन्थ संस्कृत व्याकरण के अध्येताओं के लिए अत्यन्त लाभप्रद होगा।