महर्षि दयानन्द सरस्वती “सम्पूर्ण जीवन – चरित्र”

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पुस्तक का नाम – महर्षि दयानन्द सरस्वती “सम्पूर्ण जीवन – चरित्र”
लेखक का नाम – पं. लक्ष्मण जी आर्योपदेशक और राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

महर्षि दयानन्द जी का यह जीवन चरित्र कई दृष्टियों से बेजोड़ है। इसके लेखक का ऋषि के सम्पर्क में आये तथा उनको सुनने वाले अनेक व्यक्तियों से सम्बन्ध रहा। इस ग्रन्थ में पर्याप्त ऐसी सामग्री है जो आपको किसी अन्य ग्रन्थ में नहीं मिलेगी। पं. लेखराम जी के पश्चात् श्रद्धेय लक्ष्मण जी ने ही इस ग्रन्थ को लिखते हुए अनेक नये तत्कालीक पत्रों का उपयोग प्रयोग किया। ‘प्रकाश’ साप्ताहिक उर्दू ने ही आर्यसमाज में विशेषाङ्कों की परम्परा चलाई थी। प्रकाश के ऋषि अङ्कों में समय-समय पर ऋषि दर्शन करने वाले कई भारतीयों के लेख व संस्मरण छपते रहे जिनका लक्ष्मण जी ने भरपूर लाभ उठाया। लेखक ने 25 वर्ष का लम्बा समय ऋषि जीवन की खोज में व्यतीत किया है।

ग्रन्थ के अनुवादक सम्पादक श्री राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’ ने कई परिशिष्ट व पाद-टिप्पणियाँ देकर इस समय सर्वथा अप्राप्य पत्रिकाओं, पुस्तिकाओं, रिपोर्टों तथा अन्य दस्तावेजों के प्रमाण देकर ग्रन्थ की गरिमा को चार चाँद लगा दिये हैं। यत्र – तत्र ऋषि जीवन पर किये जाने वाले प्रश्नों, आपत्तियों व शङ्काओं के सप्रमाण उत्तर देकर इतिहास शास्त्र की बड़ी भारी सेवा की है।

इस ग्रन्थ में पाठक पहली बार वो पढ़ेगें जो अन्य जीवनियों में नही है –

1. इस ग्रन्थ में एक-एक घटना पर विचार किया है। सर्वसामर्थ्य से तथ्यों की जाँच – पड़ताल की है। सन्, सम्वत्, तिथि, वार में जहाँ कहीं भूल-चूक लगी उन्हें सुधारने का यत्न किया है।
2. पं. लेखराम जी, पूज्य लक्ष्मण जी ने यत्र-तत्र घटनाओं के प्रमाण दिये हैं। इसके पूरक सामग्री देकर और नये-नये प्रमाण भी जो़ड़े गये हैं।
3. ऋषि दयानन्द के विरोधी अन्य मतावलम्बियों के ग्रन्थों का अवलोकन करके ऋषि के व्यक्तित्व व उपलब्धियों पर नया प्रकाश डाला है। यथा – श्री पं. गंगाप्रसाद शास्त्री जी, जीयालाल जी सैनी, राधास्वामी गुरु हजूरजी महाराज की पुस्तकों के अवतरण इस जीवनी में दिये गये हैं।
4. ऋषि के जीवन पर किये जाने वाले एक-एक आक्षेप का सप्रमाण उत्तर यथास्थान मिलेगा। महर्षि के जीवन-काल में ही उन्हें देशभर में ऋषि और महर्षि माना गया, इसके अनेक प्रमाण खोज-खोज कर इस ग्रन्थ में दिये गये हैं। ज्ञानी दित्तिसिहं की ऋषि-निन्दा में लिखी पुस्तक में भी यह खुल कर स्वीकार किया गया है। इसमें कविश्यामलदास की कविताओं से प्रमाण दिये गये हैं।
5. महर्षि के बलिदान, विषपान पर पर्याप्त नई सामग्री दी गई है। मिर्जा कादियानी ऋषि को हलाक करवाने का श्रेय लेता है। यह प्रमाण अन्य किसी जगह नहीं है। इस ग्रन्थ में पाठक पहली बार इसे पढ़ेगे।
6. ऋषि की अलीगढ़, छलेसर व अमृतसर आदि की कुछ यात्राओं का प्रथम बार उल्लेख किया गया है।
7. पं. लेखराम जी तथा लक्ष्मण जी की अशुद्धियों को सुधारा गया है।
8. कई महत्त्वपूर्ण पत्रों को इस ग्रन्थ में पहली बार ही स्थान मिला है। इतिहास में उन पत्रों का कभी मूल्यांकन न किया जा सका।
9. महर्षि द्वारा जालन्धर के एक व्याख्यान में अत्यन्त निर्भीकता से कही गई क्रान्तिकारी बातों को न जाने क्यों कुछ जीवनी लेखकों ने अपने ग्रन्थों से हटा दिया। इस ग्रन्थ में उसे सम्मलित किया गया है।
10. कई विशेष घटनाओं का इसमें उल्लेख किया है जैसे कि लाला जीवनदास जी ने भी महर्षि की अर्थी को कंधा दिया था आदि।
11. कर्नल अल्काट के इस लेख का सप्रमाण प्रतिवाद किया है कि महर्षि ने थियोसाफिस्टों से सहारनपुर में कोई बैठक की थी।
12. अनेक दुर्लभ चित्रों को इस जीवनी में प्रथमबार दिया गया है।
13. दक्षिण भारत के प्रथम आर्यसमाज के विवरण इसमें दिया गया है।
14. आर्यसमाचार, भारत सुदशा प्रवर्त्तक, आर्य गजट, आर्य दर्पण, प्रकाश आदि पत्रों के कई पृष्ठों को स्कैनिंग करके लगाया गया है।

इस पुस्तक से अवश्य ही महर्षि प्रेमी लाभान्वित होंगे।