न्यायदर्शनम् (वात्साययनभाष्यसहितम्)

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पुस्तक का नाम – न्यायदर्शनम् (वात्साययनभाष्यसहितम्)
अनुवादक एवं व्याख्याकार – आचार्य ढुण्ढिराजशास्त्री

भारत में दर्शनों के दो भेद मुख्यतः प्रचलित है। जिन्हें हम आस्तिक और नास्तिक दर्शनों के नाम से जानते हैं। आस्तिक दर्शन और नास्तिक दर्शनों में मुख्यतः अन्तर वेद प्रमाण का है अर्थात् जो दर्शन वेदों के प्रमाणत्व को स्वीकार करे, उसे आस्तिक और जो वेदों को अप्रमाणित माने उसे नास्तिक कहते हैं।
इनके विभाजन निम्न प्रकार है – 
(1) आस्तिक दर्शन – मीमांसा, न्याय, सांख्य, वैशेषिक, योग और वेदान्त है। यही आर्ष दर्शन है। इनके पश्चात् कुछ दर्शन सम्प्रदाय विशेष के कारण बहुत बाद में अस्तित्व में आए, जिनके नाम सर्वदर्शनसंग्रह में आए हैं – रामानुजन, पूर्णप्रज्ञ, पाशुपत, शैव, रसेश्वर और शांकर वेदान्तादि।
(2) नास्तिक दर्शन – इन दर्शनों में मुख्यतः जैन, बौद्ध और चार्वाक आते हैं। इनमें भी बौद्ध और जेनों में कई विभाग और उपविभाग हो गये। जैसे कि जैन में श्वेताम्बर और दिगम्बरादि। बौद्धों में माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक तथा वैभाषिकादि।
इनमें से आस्तिक दर्शनों में से न्याय दर्शन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह तर्क को महत्त्व देता है, इसलिए इसे अनेकों स्थान पर साक्षात् तर्कशास्त्र से सम्बोधित किया गया है। जैसे कि शुक्रनीतिसार में – “मीमांसा-तर्क-सांख्यानि वेदान्तो योग एव च”
तर्क द्वारा धर्म का निर्णय करने का उल्लेख वेदादिस्मृतियों में भी है। मनुस्मृति में भी कहा गया है – “यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्म वेद नेतरः।।” किन्तु प्रत्येक जगह कुतर्क और जल्पवाद को अमान्य माना गया है।
अतः तर्क और तर्क द्वारा पदार्थ निर्णय करना एक आर्षविधि ही है। यही प्रमाणों और युक्तियों के आधार पर किसी पदार्थ को जानने की विधि का वर्णन करने वाला शास्त्र न्याय शास्त्र है। इस दर्शन में प्रमाण और प्रमेय के द्वारा कई वैदिक सिद्धान्तों जैसे –
आत्मा, पुनर्जन्म, कर्मफल, वेद आदि की सिद्धि की गई है। इसमें वाद विवाद के नियमों और हेत्वाभासों का पर्याप्त विवेचन किया गया है।
इसी दर्शन पर महर्षि वात्साययन रचित वात्साययन भाष्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और प्राचीन है। इस भाष्य के अध्ययन का उल्लेख स्वामी दयानन्द सरस्वती जी नें सत्यार्थ प्रकाश, संस्कार विधि और ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में किया है।

प्रस्तुत संस्करण न्याय दर्शन और उसके वात्सायन भाष्य का हिन्दी में अनुवाद है। इसमें सूत्र और उसके भाष्य का भाषार्थ किया है तथा कुछ अस्पष्ट शब्दों को सविस्तार विवेचन किया गया है। यह हिन्दी भाषा में होने के कारण हिन्दी भाषी दर्शनशास्त्र के छात्रों और दर्शन प्रेमियों के लिए अत्यन्त लाभदायक सिद्ध होगा।