About Vedrishi

मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य आनन्द की प्राप्ति है। ज्ञान एवं आनन्द में अन्तः सम्बन्ध है। महर्षि वेदव्यास ने गीता में कहा है- “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते” अर्थात् “ज्ञान के सदृश पवित्र वस्तु संसार में दूसरी नहीं है।” ज्ञान से मनोगत कालुष्य मिटता है तथा बुद्धि निर्मल होती है। निर्मल बुद्धि से ही मनुष्य सदाचरण में प्रवृत्त होता है।

ज्ञान की यथावत् प्राप्ति में ऋषि-प्रणीत ग्रन्थों का स्वाध्याय अत्यन्त सहायक सिद्ध होता है ।

ऋषि-प्रणीत ग्रन्थों को इसीलिए पढना चाहिए, क्योंकि वे पक्षपातरहित, धर्मात्मा, विद्वानों के द्वारा प्रकाशित होते हैं। महर्षि दयानन्द सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं- “महर्षि लोगों का आशय, जहाँ तक हो सके वहाँ तक सुगम और जिसके ग्रहण करने में थोड़ा समय लगे, इस प्रकार का होता है। पक्षपात-पूर्ण लेखकों द्वारा रचित ग्रन्थ अनार्ष-ग्रन्थ कहलाता है, जिसका स्वाध्याय ऐसा है कि जैसे पहाड़ का खोदना और कौड़ियो का लाभ होना। जबकि आर्ष-ग्रन्थों का पढना ऐसा है कि जैसे एक गोता लगाना और बहुमूल्य रत्नों का पाना।”
अतः आर्ष-ग्रन्थों के स्वाध्याय की विशेष महत्ता है।

वेदर्षि का मुख्य उद्देश्य आर्ष-ग्रन्थों का विभिन्न प्रकार से प्रचार-प्रसार करना है। इसके अन्तर्गत आर्ष-पुस्तकों को न्यूनतम सम्भावित मूल्य पर पाठकों को उपलब्ध कराना, आर्ष-पुस्तकों का digitization, संस्कृत-भाषा की निःशुल्क शिक्षा, दुर्लभ ग्रन्थों को प्रकाशित कराना, विद्वानों के लेखों से शंकाओं का निवारण आदि कार्य हैं। इस ईश्वरीय कार्य में आप सभी विद्वानों का तन-मन-धन से सहयोग अपेक्षित है। हमारी योजना निकट भविष्य में वेदों के निःशुल्क वितरण की है, इस हेतु प्रारम्भ में वेदों को न्यूनतम मूल्य पर पाठकों को उपलब्ध कराया जाएगा। वेदों के साथ वेदार्थ में सहायक ग्रन्थ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका और सत्यार्थ-प्रकाश के वितरण की भी योजना है।

इस वेबसाइट vedrishi.com पर वेदादि आर्ष-ग्रन्थों पर आधारित सामग्रियों को शब्द (Text), चित्र (Picture), श्रव्य (Audio), चलचित्र (Video), प्रदर्शन (Presentation), लेखाचित्र (Infographics) आदि के रूप में प्राप्त किया जा सकता है।

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